नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में 'New Delhi Declaration' को मंजूरी दी गई है। इसमें न्यूक्लियर संघर्ष के बढ़ते खतरों पर चिंता जताई गई है, जो ग्लोबल ट्रेड और वित्तीय व्यवस्था के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत है।
नई दिल्ली में संपन्न हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में 11 सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से 'New Delhi Declaration' को अपनाया है। शिखर सम्मेलन के दौरान सबसे अहम चर्चा परमाणु संघर्ष के बढ़ते जोखिमों और आर्म्स कंट्रोल संधियों के कमजोर होने पर रही। घोषणापत्र में नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमलों की निंदा की गई और संघर्ष के दौरान शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं की सुरक्षा पर जोर दिया गया है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
यह घोषणापत्र सिर्फ कूटनीतिक नहीं है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, जो ग्लोबल GDP और ऊर्जा खपत का एक बड़ा हिस्सा हैं, जब ऐसी चिंताएं जताती हैं, तो यह सीधे तौर पर ट्रेड पॉलिसी और एनर्जी सिक्योरिटी में बदलाव का संकेत होता है। भू-राजनीतिक तनाव अब सदस्य देशों की लंबी अवधि की आर्थिक प्लानिंग का मुख्य हिस्सा बन चुके हैं।
वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था की ओर कदम
निवेशकों के लिए एक बड़ी मॉनिटरेबल चीज़ है—आर्थिक लचीलापन। सदस्य देशों ने पेमेंट सेटलमेंट के लिए वैकल्पिक वित्तीय तंत्र (Alternative Financial Mechanisms) बनाने पर जोर दिया है। इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों के बैंकिंग सिस्टम पर निर्भरता को कम करना है ताकि भविष्य में किसी भी तरह के एकतरफा प्रतिबंधों या वित्तीय पाबंदियों के बावजूद ट्रेड जारी रहे।
कमोडिटी मार्केट पर असर
भू-राजनीतिक बदलावों का सीधा असर कमोडिटी मार्केट और ग्लोबल सप्लाई चेन पर देखने को मिल सकता है। दुनिया के दो हिस्सों में बंटने (Fragmentation) से ऊर्जा और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव (Volatility) बढ़ सकता है। सदस्य देशों की कोशिश अब अपनी सप्लाई लाइन्स को सुरक्षित करने की है। आने वाले समय में, इन प्रस्तावित वित्तीय पेमेंट स्ट्रक्चर्स और ट्रेड एग्रीमेंट्स का क्रियान्वयन यह तय करेगा कि ग्लोबल फाइनेंस से ये देश खुद को कितनी मजबूती से अलग (Decoupling) कर पाते हैं।
