नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में 'New Delhi Declaration' को अपनाया गया है। मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की इस मांग से ग्लोबल मार्केट की अस्थिरता और एनर्जी सप्लाई चेन के जोखिमों पर सीधा असर पड़ सकता है।
कूटनीतिक पहल और ग्लोबल स्टेबिलिटी
नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालातों पर चिंता जताई। उन्होंने सदस्य देशों से सामूहिक कूटनीतिक कदम उठाने का आग्रह किया। सम्मेलन के दौरान जारी 'New Delhi Declaration' में भी मिडिल ईस्ट युद्ध को लेकर गहरी चिंता जताई गई है और सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने की अपील की गई है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?
भारतीय बाजारों और ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए यह कूटनीति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मिडिल ईस्ट क्रूड ऑयल और नेचुरल गैस की सप्लाई का सबसे बड़ा हब है। 'Strait of Hormuz' जैसे महत्वपूर्ण रास्तों पर कोई भी तनाव सीधे तौर पर एनर्जी की कीमतों में वोलेटिलिटी बढ़ाता है। इसका सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और ट्रांसपोर्टेशन की लागत पर पड़ता है। क्षेत्र में शांति की कोई भी कोशिश सप्लाई चेन के जोखिमों को कम करने के रूप में देखी जा रही है।
भविष्य की दिशा और चीन की भूमिका
सम्मेलन में यह स्पष्ट हो गया है कि साल 2027 में चीन BRICS की अध्यक्षता संभालेगा। इससे संकेत मिलता है कि आगामी वर्ष में ब्लॉक का फोकस नई इकोनॉमिक पॉलिसी और सदस्य देशों के बीच आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर रहेगा।
हालांकि, बाजार के जानकारों का कहना है कि यह देखना अभी बाकी है कि क्या अलग-अलग हितों वाले ये देश अपनी विदेश नीति में कितना तालमेल बिठा पाते हैं। आने वाले समय में ट्रेड कोऑपरेशन और एनर्जी पार्टनरशिप से जुड़े फैसलों पर बाजार की नजर बनी रहेगी, क्योंकि यही चीजें लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट पॉलिसी को दिशा देंगी।
