नई दिल्ली में संपन्न हुए 18वें BRICS समिट में 'नई दिल्ली डिक्लेरेशन' जारी किया गया है। इसमें गाजा में तुरंत सीजफायर और फिलिस्तीन को मान्यता देने पर जोर दिया गया है, साथ ही प्रोटेक्शनिस्ट ट्रेड नीतियों पर चिंता जताई गई है जो ग्लोबल मार्केट के लिए अहम हैं।
नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में सभी 11 सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से 'नई दिल्ली डिक्लेरेशन' को अपनाया है। राजनयिक मोर्चे पर यह घोषणा गाजा में तुरंत सीजफायर और 1967 की सीमाओं के आधार पर दो-देश समाधान (Two-state solution) के समर्थन में है। निवेशकों के नजरिए से, यह समिट मैक्रो-इकोनॉमिक अस्थिरता और ग्लोबल सप्लाई चेन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है।
बिजनेस जगत के लिए क्या हैं संकेत?
समिट में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग के साथ-साथ एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और प्रोटेक्शनिस्ट ट्रेड उपायों का कड़ा विरोध किया गया है। घोषणा पत्र में ट्रेड बैरियर्स को लेकर चिंता जताई गई है, जिसके बाद भविष्य में देशों के बीच ट्रेड पॉलिसी में बदलाव की उम्मीद है। इसका असर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सक्रिय हैं, क्योंकि आने वाले समय में टैरिफ स्ट्रक्चर और व्यापारिक नियमों में फेरबदल हो सकता है।
भारतीय बाजार पर क्या होगा असर?
भारतीय इक्विटी मार्केट के लिए वेस्ट एशिया में जारी तनाव सबसे बड़ा चिंता का विषय है। भारत कच्चा तेल (Crude Oil) का बड़ा आयातक है, और वहां की अस्थिरता का सीधा असर एनर्जी सिक्योरिटी और प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ता है। साथ ही, सदस्यों ने अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए लोकल करेंसी में क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट पर भी चर्चा की है। भले ही अभी कोई कॉमन करेंसी की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम पर काम शुरू होना बैंकिंग सेक्टर के लिए लॉन्ग-टर्म में एक बड़ा अपडेट हो सकता है। फिलहाल, निवेशक US Federal Reserve के फैसलों और क्रूड ऑयल की कीमतों पर अपनी नजरें जमाए हुए हैं।
