ऑस्ट्रेलिया के विपक्षी दल, लिबरल-नेशनल कोएलिशन ने देश में बढ़ते हाउसिंग संकट से निपटने के लिए माइग्रेशन नीति में ऐतिहासिक बदलाव का प्रस्ताव रखा है। अब सालाना नेट माइग्रेशन को घटाकर **1 लाख** करने और अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या को **2.4 लाख** तक सीमित करने की योजना है।
ऑस्ट्रेलिया में बढ़ती महंगाई और घरों की कमी के बीच विपक्षी नेता एंगस टेलर ने माइग्रेशन पॉलिसी में बड़े बदलाव का ऐलान किया है। इस नई योजना के तहत, सरकार बनने पर पहले दो साल के लिए नेट ओवरसीज माइग्रेशन को 1 लाख सालाना तक सीमित रखा जाएगा, जिसे बाद में चौथे साल तक 1.6 लाख तक बढ़ाया जा सकता है। इसका सीधा असर यह होगा कि चार साल के भीतर 6.5 लाख अस्थायी वीजा में कटौती की जाएगी।
घरों की सप्लाई से जुड़ा माइग्रेशन
कोएलिशन का सबसे अहम कदम माइग्रेशन को सीधे हाउसिंग सप्लाई से जोड़ना है। योजना के मुताबिक, हर साल उतनी ही माइग्रेशन की अनुमति दी जाएगी, जितने नए घरों का निर्माण पूरा होगा। इसका मकसद प्रॉपर्टी मार्केट में बढ़ती कीमतों और रेंटल स्ट्रेस को कंट्रोल में लाना है।
छात्रों के लिए क्या हैं संकेत?
एजुकेशन सेक्टर पर भी सख्ती की गई है। इंटरनेशनल स्टूडेंट्स की संख्या को 2.4 लाख पर कैप किया जाएगा और 'टेम्परेरी ग्रेजुएट वीजा प्रोग्राम' को खत्म करने की तैयारी है। भारत से ऑस्ट्रेलिया पढ़ने जाने वाले छात्रों के लिए यह एक बड़े बदलाव की तरह है, जिसका असर यूनिवर्सिटीज और वहां की जॉब मार्केट पर भी पड़ सकता है।
रिस्क और चुनौतियां
हालांकि, इस फैसले के आर्थिक खतरे भी कम नहीं हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि माइग्रेशन में भारी कटौती से कंस्ट्रक्शन सेक्टर में लेबर की कमी हो सकती है। अगर घरों को बनाने वाले मजदूर ही नहीं होंगे, तो निर्माण कार्य की रफ्तार धीमी हो जाएगी, जिससे प्रोजेक्ट्स में देरी और लागत में बढ़ोतरी तय है। इसके अलावा, मानवीय वीजा में भी 50% की कटौती करते हुए इसे 10,000 सालाना तक सीमित कर दिया गया है। चुनाव नजदीक आते ही माइग्रेशन बनाम हाउसिंग का यह मुद्दा अब वहां की राजनीति के केंद्र में आ गया है।
