11 सितंबर, 2026 को 9/11 हमलों के 25 साल पूरे हो गए हैं। इस दौरान अमेरिका की रणनीति में आए बदलाव और चीन के साथ बढ़ते तनाव ने ग्लोबल सप्लाई चेन और निवेशकों की सेंटीमेंट को पूरी तरह बदल दिया है, जो भारतीय मैन्युफैक्चरिंग के लिए नए मौके पैदा कर रहा है।
9/11 हमलों के बाद की दो दशकों की अवधि में अमेरिका का पूरा ध्यान आतंकवाद के खिलाफ जंग पर केंद्रित था, जिस पर अनुमानित $8 ट्रिलियन से ज्यादा की भारी-भरकम राशि खर्च की गई। इस दौरान वैश्विक व्यापार का गणित पूरी तरह बदल गया और चीन को एक मैन्युफैक्चरिंग सुपरपावर बनने का मौका मिल गया। 2000 से 2025 के बीच चीन एक साधारण निर्यातक से दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी सप्लायर बन गया।\n\n### ग्रेट पावर कॉम्पिटिशन का दौर\n\nसाल 2026 तक आते-आते वैश्विक प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं। अमेरिका अब आतंकवाद के बजाय 'ग्रेट पावर कॉम्पिटिशन' को अपनी सबसे बड़ी चुनौती मानता है। अब जियोपॉलिटिक्स का मतलब सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि इकोनॉमिक और टेक्नोलॉजी पर वर्चस्व की लड़ाई है।\n\n### भारतीय निवेशकों के लिए क्या है मौका?\n\nपश्चिमी देश अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए 'China+1' जैसी रणनीतियां अपना रहे हैं, जिसका सीधा फायदा भारत जैसे मैन्युफैक्चरिंग हब को मिल सकता है। हालांकि, ट्रेड प्रोटेक्शनिज्म, टैरिफ और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते तनाव से बाजार में अस्थिरता (Volatility) बने रहने की आशंका भी है। निवेशकों को अब सप्लाई चेन रीस्ट्रक्चरिंग, एक्सपोर्ट कंट्रोल और सरकारी नीतियों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि इनका असर सीधे कमोडिटी और टेक्नोलॉजी की कीमतों पर पड़ेगा।
