18th BRICS Summit: PM मोदी की वैश्विक सुधारों पर दहाड़, क्या बदलेगी दुनिया की आर्थिक तस्वीर?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
18th BRICS Summit: PM मोदी की वैश्विक सुधारों पर दहाड़, क्या बदलेगी दुनिया की आर्थिक तस्वीर?

नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक संस्थानों में बड़े बदलावों की वकालत की है। उनका जोर उभरती अर्थव्यवस्थाओं को 'नियम मानने वालों' से 'नियम बनाने वालों' की श्रेणी में लाने पर है ताकि ग्लोबल ट्रेड और सप्लाई चेन में ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत हो सके।

नई दिल्ली में 12-13 सितंबर, 2026 को आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन का आह्वान किया है। इस दौरान उन्होंने विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) और बहुपक्षीय विकास बैंकों (Multilateral Development Banks) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

'रूल-मेकर्स' बनने की ओर भारत

इस समिट का मुख्य एजेंडा ग्लोबल साउथ को 'रूल-टेकर्स' (नियम मानने वाले) से 'रूल-शapers' (नियम बनाने वाले) के रूप में बदलना है। भारतीय निवेशकों और बिजनेस जगत के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून और वित्तीय नियम सीधे तौर पर हमारे कैपिटल एक्सेस और एक्सपोर्ट को प्रभावित करते हैं। भारत का स्पष्ट रुख है कि 20वीं सदी के ढांचे अब 21वीं सदी की डिजिटल ट्रेड और सप्लाई चेन चुनौतियों के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इकोनॉमी पर क्या होगा असर?

यह केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए भी अहम है। समिट में ट्रेड कॉरिडोर और पेमेंट मैकेनिज्म पर हो रही चर्चा, भविष्य में पारंपरिक वित्तीय प्रणालियों पर निर्भरता कम कर सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लेनदेन की लागत (Transaction Cost) में कमी आ सकती है। सप्लाई चेन रेजिलिएंस पर जोर देकर भारत खुद को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में और मजबूती से पेश कर रहा है।

चुनौतियों का यथार्थ

निवेशकों को यह भी समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में बदलाव रातों-रात नहीं होता। मौजूदा पावर स्ट्रक्चर अक्सर बदलाव का विरोध करते हैं। इसके अलावा, वेस्ट एशिया और ईस्टर्न यूरोप में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कई देशों पर बढ़ता कर्ज का बोझ इस सुधार प्रक्रिया की गति को धीमा कर सकता है। निवेशकों के लिए समिट के अंत में आने वाले फाइनल डिक्लेरेशन पर नजर रखना सबसे जरूरी होगा, विशेषकर करेंसी कोऑपरेशन और ट्रेड एग्रीमेंट्स के संदर्भ में।

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