नई दिल्ली में संपन्न हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सदस्य देशों के नेताओं ने 'New Delhi Declaration' को अपनाया है। 11 देशों के इस समूह का मुख्य जोर अब ग्लोबल गवर्नेंस में सुधार और आर्थिक मजबूती पर है, जो भारतीय निवेशकों के लिए भी बेहद अहम है।
12 सितंबर 2026 को भारत मंडपम में संपन्न हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में 11 सदस्यीय ब्लॉक के नेताओं ने भविष्य की दिशा तय की। नेताओं ने बरगद के पेड़ लगाकर समूह के विस्तार और मजबूत होती भू-राजनीतिक पकड़ का संदेश दिया। हालांकि, समिट का सबसे बड़ा आउटकम 'New Delhi Declaration' है, जो आने वाले समय में वैश्विक व्यापार और वित्त की रूपरेखा तय करेगा।
ग्लोबल ट्रेड और गवर्नेंस पर असर
घोषणापत्र में ब्राजील, चीन, भारत, रूस, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों ने मिलकर IMF और World Bank जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग की है। निवेशकों के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली में कोई भी बदलाव दुनिया भर में कैपिटल फ्लो को प्रभावित कर सकता है। सदस्य देशों ने एकतरफा ट्रेड बैरियर्स पर चिंता जताते हुए, पश्चिमी देशों पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए नए सुरक्षित ट्रेड कॉरिडोर बनाने का संकेत दिया है।
पेमेंट सिस्टम में बड़े बदलाव की तैयारी
समिट का एक अहम मुद्दा क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट मैकेनिज्म को मजबूत करना था। समूह मौजूदा ग्लोबल फाइनेंशियल नेटवर्क पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसका असर इंटरनेशनल ट्रेड, लॉजिस्टिक्स और बैंकिंग सेक्टर से जुड़ी कंपनियों पर पड़ सकता है। यदि ट्रेड सेटलमेंट की प्रक्रिया अधिक लचीली होती है, तो भारतीय कंपनियों का अपने BRICS साझेदारों के साथ लेनदेन का तरीका पूरी तरह बदल सकता है।
जोखिम और बाजार की हकीकत
11 सदस्यों के होने से समूह का मार्केट साइज तो बड़ा हो गया है, लेकिन इसके साथ ऑपरेशनल चुनौतियां भी जुड़ी हैं। सबसे बड़ा रिस्क इतने विविध देशों के बीच आपसी सहमति बनाए रखने का है। जहां ऊर्जा उत्पादक देश एक तरफ हैं, वहीं बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब दूसरी ओर, जिससे आर्थिक प्राथमिकताओं में टकराव होना तय है। निवेशकों को यह नजर रखनी चाहिए कि ये पॉलिसी गोल्स जमीन पर कितनी तेजी से ट्रेड एग्रीमेंट में बदलते हैं। आने वाले समय में सप्लाई चेन की स्थिरता और नए पेमेंट सिस्टम की सफलता ही यह तय करेगी कि क्या ये वादे कंपनियों के लिए वाकई फायदेमंद साबित होंगे।
