भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर, पोर्ट पर बढ़ी मुश्किलें
पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कई एयरस्पेस बंद कर दिए गए हैं और शिपिंग रूट्स पर अनिश्चितता छा गई है। इसी का नतीजा है कि भारत के प्रमुख कंटेनर पोर्ट JNPT पर जहाजों के पहुंचने पर जाम (congestion) बढ़ रहा है। इसका सीधा असर भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर पर पड़ रहा है, खासकर उन सामानों पर जिनकी लाइफ जल्दी खत्म हो जाती है (perishable commodities)। यह स्थिति भारत के 56% मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट के लिए एक बड़ा झटका है, जो अमेरिका और यूरोप जैसे मुख्य बाजारों तक पहुंचने के लिए इन रास्तों पर निर्भर करते हैं।
फल-सब्जियों के एक्सपोर्ट पर भारी संकट, लागत बढ़ी, बर्बादी का खतरा
इस मुश्किलों का सबसे ज्यादा सामना कर रहे हैं अंगूर, प्याज और अन्य फल-सब्जियों के एक्सपोर्टर। इन संवेदनशील सामानों वाले कंटेनरों को रेफ्रिजरेशन (refrigeration) की जरूरत होती है, जिस पर रोजाना करीब ₹8,000 का अतिरिक्त खर्चा आ रहा है। अगर यह रुकावटें लंबी खिंचती हैं, तो एक्सपोर्टर्स को हर कंटेनर को ₹5,000-6,000 के अतिरिक्त खर्चे पर उतारना पड़ सकता है। इससे सामान के खराब होने और भारी नुकसान का खतरा काफी बढ़ जाएगा। इंडस्ट्री के लोग अगले 48 से 72 घंटों में स्थिति सुधरने की उम्मीद कर रहे हैं, क्योंकि भेजे गए कंसइनमेंट (consignments) को वापस मंगाना एक हकीकत बनता जा रहा है। हॉर्टिकल्चर प्रोड्यूस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (Horticulture Produce Exporters Association) ने APEDA के माध्यम से सरकार से इन बढ़ते खर्चों को वहन करने की मांग भी की है। मौजूदा समय में रीफर कंटेनरों के लिए डिटेंशन चार्ज (detention charges) भी ₹235 प्रति दिन तक पहुंच सकते हैं, जो कि फ्री पीरियड खत्म होने के बाद लगता है।
सप्लाई चेन की कमजोरियां आईं सामने
हालांकि JNPT ने अपने ऑपरेशंस में सुधार दिखाया है और कंटेनर पोर्ट परफॉर्मेंस इंडेक्स (CPPI) 2024 में 19वें स्थान पर रहा है, लेकिन यह संकट भारत की सप्लाई चेन में मौजूद कमजोरियों को उजागर कर रहा है। यूरोप जाने वाले 80% भारतीय एक्सपोर्ट इसी वेस्ट एशियन ट्रेड रूट से होकर गुजरते हैं, जो इसे बहुत संवेदनशील बनाता है। 2023 के अंत से 2025 तक चले रेड सी क्राइसिस (Red Sea crisis) के दौरान फ्रेट रेट (freight rates) दो से तीन गुना, और कुछ मामलों में आठ गुना तक बढ़ गए थे। साथ ही, ट्रांजिट टाइम (transit time) 15-20 दिन बढ़ गया था। इतने लंबे समय तक परशिएबल (perishable) सामानों का ट्रांजिट टाइम उसकी मार्केट वैल्यू के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
भारत का हॉर्टिकल्चर सेक्टर, जो फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, सीधे तौर पर खतरे में है। इस साल 2024-25 में उत्पादन 4% बढ़कर 369.05 मिलियन टन तक पहुंचा था। मौजूदा संकट के चलते, कई बड़ी शिपिंग लाइनों ने बुकिंग रोक दी है और जहाजों को केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) से घुमा रहे हैं। इससे फ्रेट कॉस्ट (freight costs) और इंश्योरेंस प्रीमियम (insurance premiums) में और इजाफा होगा। इसके अलावा, परशिएबल सामानों पर एयर फ्रेट (air freight) पर लगने वाले 18% GST जैसी मौजूदा दिक्कतों से भारतीय एक्सपोर्ट पहले ही कम प्रतिस्पर्धी हो गए थे। अब भू-राजनीतिक अस्थिरता को भारतीय व्यवसायों के लिए सबसे बड़ा भविष्य का खतरा माना जा रहा है, जहां करीब आधे से ज्यादा एग्जीक्यूटिव्स (executives) इसे अगले पांच वर्षों में सबसे गंभीर चुनौती मानते हैं।
मार्केट पर असर और आगे का रास्ता
इस भू-राजनीतिक रुकावटों का असर लॉजिस्टिक्स सेक्टर की बड़ी कंपनियों पर भी पड़ सकता है। Adani Ports (मार्केट कैप: ₹3.50T, P/E: 28.53x) और Gateway Distriparks (मार्केट कैप: ₹2.94T, P/E: 10.94x) जैसी कंपनियों को कार्गो वॉल्यूम (cargo volumes) में कमी और ऑपरेशनल जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। APEDA (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority) एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम कर रहा है, लेकिन यह मौजूदा संकट एक कड़ी परीक्षा साबित होगी। सरकार का लॉजिस्टिक्स को सुचारू बनाने पर जोर, जिसे वर्ल्ड बैंक के लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स (Logistics Performance Index) 2023 में 38वें स्थान से देखा जा सकता है, अब इन तात्कालिक रुकावटों से निपटने और लंबी अवधि की सप्लाई चेन की कमजोरियों को दूर करने में परखा जाएगा। यह स्थिति साफ करती है कि भारत को ट्रेड रूट्स में विविधता लाने और किसी भी भू-राजनीतिक झटके से अपने महत्वपूर्ण एक्सपोर्ट सेक्टर को बचाने के लिए मजबूत आकस्मिक योजना (contingency planning) बनाने की तत्काल आवश्यकता है।