पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने भारतीय एविएशन सेक्टर को बड़ी मुश्किल में डाल दिया है। युद्ध-जोखिम (War-Risk) बीमा प्रीमियम में बेतहाशा वृद्धि और नए सुरक्षा नियमों के कारण एयरलाइंस पर वित्तीय बोझ बढ़ गया है। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) की ओर से जारी की गई एडवायज़रीज (Advisories) ने सुरक्षा बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन इससे एयरलाइंस के लिए फाइनेंशियल रिस्क (Financial Risk) और बढ़ गया है।
एयरलाइंस पायलट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ALPA) ने चिंता जताई है कि कमर्शियल एयरलाइंस के पास संघर्ष वाले क्षेत्रों में जोखिम का आकलन करने के लिए जरूरी इंटेलिजेंस (Intelligence) नहीं है। ALPA का कहना है कि यह जिम्मेदारी सरकारी एजेंसियों की होनी चाहिए, न कि एयरलाइंस की, खासकर जब पायलटों के लिए वॉर-रिस्क इंश्योरेंस (War-Risk Insurance) को मान्य करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देशों के बिना DGCA एयरलाइंस से खुद रिस्क असेसमेंट (Risk Assessment) करने की उम्मीद कर रहा है।
भारतीय एयरलाइंस के लिए पश्चिम एशिया के लिए उड़ान भरने या वहां से गुजरने वाले मार्गों पर 'वॉर-रिस्क इंश्योरेंस' प्रीमियम कई गुना बढ़ गए हैं। एक नैरो-बॉडी जेट (Narrow-body jet) के लिए राउंड ट्रिप पर यह अतिरिक्त प्रीमियम ₹30 लाख से ₹40 लाख (लगभग $36,000–$48,000 USD) तक पहुंच सकता है। वहीं, वाइड-बॉडी प्लेन (Wide-body planes) के लिए यह आंकड़ा ₹90 लाख से ₹1 करोड़ (लगभग $108,000–$120,000 USD) तक चला जाता है। इससे खाड़ी देशों की उड़ानों पर प्रति यात्री ₹20,000–₹35,000 (लगभग $240–$420 USD) का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। इंश्योरर्स (Insurers) इसे केवल एक अस्थायी बढ़ोतरी नहीं, बल्कि कीमतों में एक स्थायी बदलाव मान रहे हैं। यह लागत वृद्धि ऐसे समय में आई है जब एविएशन फ्यूल (Aviation Fuel) की कीमतें पहले ही मार्च 2026 तक लगभग 6% बढ़ चुकी हैं और वैश्विक तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के चलते $105 प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं।
यह लागत वृद्धि एयरलाइंस की कमाई पर भारी पड़ रही है। कुल मिलाकर, भारतीय एयरलाइंस रद्द की गई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से ₹566.4 करोड़ (लगभग $68 मिलियन USD) का भारी राजस्व खो चुकी हैं। एयर इंडिया, जो पश्चिम एशिया में काफी उड़ानें भरती है, विशेष रूप से प्रभावित हुई है। खबरों के मुताबिक, संघर्ष शुरू होने के बाद से एयर इंडिया ने करीब 2,500 उड़ानें रद्द की हैं और मध्य पूर्व में अपनी उड़ानों को काफी कम कर दिया है। एयर इंडिया ग्रुप को बड़े वित्तीय झटके की आशंका है, और उम्मीद जताई जा रही है कि मार्च 2026 को समाप्त होने वाले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के लिए कंपनी का घाटा रिकॉर्ड ₹15,000 करोड़ (लगभग $1.6 बिलियन USD) तक पहुंच सकता है। इंडिगो (IndiGo) जैसी अन्य एयरलाइंस के प्रॉफिट (Profit) में भी कमी आई है। रेटिंग एजेंसी ICRA ने भारतीय एविएशन इंडस्ट्री के आउटलुक (Outlook) को 'नेगेटिव' (Negative) कर दिया है, जिसमें संघर्ष, मुद्रा में गिरावट और ईंधन की बढ़ती कीमतों को मुख्य कारण बताया गया है। ICRA का अनुमान है कि FY2026 में इंडस्ट्री को कुल ₹170-180 अरब का नेट लॉस (Net Loss) हो सकता है।
ALPA ने अतीत की घटनाओं जैसे ईरान एयर फ्लाइट 655, लीबियाई अरब एयरलाइंस फ्लाइट 114 और यूक्रेन इंटरनेशनल एयरलाइंस फ्लाइट 752 को याद दिलाते हुए कहा है कि ये घटनाएं संघर्ष वाले क्षेत्रों के पास या उसके अंदर उड़ान भरने के खतरों को दर्शाती हैं। ऐतिहासिक रूप से, ऐसी घटनाओं ने बीमा लागत को बढ़ाया है और मार्केट कैपेसिटी (Market Capacity) को कम किया है। ऑपरेशनल चुनौतियाँ (Operational Challenges) भी बढ़ गई हैं। DGCA ने एयरलाइंस को पश्चिम एशिया के कुछ संघर्ष वाले एयरस्पेस (Airspace) से बचने की सलाह दी है, जिसके चलते उड़ानों के रास्ते लंबे हो गए हैं, ईंधन की खपत बढ़ गई है और आपातकालीन योजनाओं (Emergency Plans) की जरूरत पड़ गई है। एयर इंडिया की यूरोप और उत्तरी अमेरिका की उड़ानें अब ज्यादा समय ले रही हैं, और अगर उड़ान प्रतिबंध (Flight Restrictions) बढ़ते हैं तो यह लाभप्रदता (Profitability) को प्रभावित कर सकता है। जारी संघर्ष और बंद एयरस्पेस के कारण उड़ानों में बदलाव और रद्दीकरण हुआ है, जिससे लागतें बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान द्वारा अकेले भारतीय एयरलाइंस के लिए अपना एयरस्पेस बंद करने से एयर इंडिया को सालाना ₹4,000 करोड़ तक का नुकसान होने की बात कही गई है।
उच्च परिचालन लागत (Operating Costs), भारी बीमा प्रीमियम और पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता भारतीय एयरलाइंस के लिए एक मुश्किल आउटलुक पेश कर रही है। इंडस्ट्री की मौजूदा वित्तीय कमजोरियां, जैसे इंडिगो और एयर इंडिया जैसी एयरलाइंस पर भारी कर्ज, उन्हें बाहरी समस्याओं के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती हैं। वर्तमान में, एयरलाइंस को पश्चिम एशिया जाने वाली उड़ानों पर बड़े राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि यात्री जोखिमों से बच रहे हैं, जबकि वापसी की उड़ानें प्रवासी श्रमिकों से भरी हुई हैं। यह असंतुलन एयरलाइंस के लिए अधिक किराया वसूलने के बावजूद ब्रेक-ईवन (Break-even) करना मुश्किल बना रहा है। इसके अलावा, DGCA द्वारा 2025 के अंत में एयरफेयर लिमिट (Airfare Limits) को हटाने से किराए में और बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे यात्री वृद्धि धीमी पड़ सकती है। बीमाकर्ता 'वॉर-रिस्क' प्रीमियम में हुई बड़ी बढ़ोतरी को एक अस्थायी मुद्दा नहीं, बल्कि एक स्थायी बदलाव के रूप में देख रहे हैं, जिसका मतलब है कि लागतें ऊंची बनी रहेंगी और एयरलाइंस के वित्तीय विकल्प सीमित होंगे। अगर सऊदी अरब और ओमान जैसे देश और अधिक उड़ान प्रतिबंध लगाते हैं, तो लंबी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें अलाभकारी (Unprofitable) हो सकती हैं।
भारतीय एविएशन सेक्टर का भविष्य अनिश्चित दिख रहा है। ICRA की 'नेगेटिव' रेटिंग आगे महत्वपूर्ण चुनौतियों का संकेत देती है, और अनुमानित नेट लॉस (Net Loss) की भविष्यवाणी से ज्यादा बड़े या बढ़ते रहने की संभावना है। हालांकि घरेलू यात्रा की मांग मजबूत बनी हुई है, लेकिन बढ़ती लागतों और यात्रा चेतावनियों के कारण अंतरराष्ट्रीय यात्रा प्रभावित हो रही है। एयरलाइंस सरकार से मदद मांग रही हैं, जैसे कि ईंधन पर कर में छूट, ताकि इन बढ़ती लागतों के बोझ को कम किया जा सके। पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता का मतलब है कि बीमा और ईंधन की लागत से प्रेरित हवाई किराए में वृद्धि शायद कुछ समय तक जारी रहेगी। सेक्टर की रिकवरी (Recovery) अब काफी हद तक क्षेत्रीय संघर्षों में कमी और बीमा बाजार की स्थितियों के शांत होने पर निर्भर करती है।