Wayanad Tunnel Project: लैंडस्लाइड के बाद बढ़ी परियोजना की मुश्किलें, जांच के घेरे में सुरक्षा मानक

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Wayanad Tunnel Project: लैंडस्लाइड के बाद बढ़ी परियोजना की मुश्किलें, जांच के घेरे में सुरक्षा मानक

केरल के वायनाड जिले में हाल ही में हुए विनाशकारी लैंडस्लाइड ने ₹2,134 करोड़ की अनाकम्पाेयल-कल्‍लाडी-मेप्‍पाडी टनल रोड परियोजना पर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अपर्याप्त भूवैज्ञानिक आकलन और खराब साइट प्रबंधन इस आपदा का कारण बने, जिसमें तीन लोगों की जान चली गई।

परियोजना पर मंडराया खतरा?

वायनाड के कल्‍लाडी इलाके में 7 जुलाई 2026 को हुए भीषण भूस्खलन ने ₹2,134 करोड़ की अनाकम्पाेयल-कल्‍लाडी-मेप्‍पाडी टनल रोड परियोजना को जनता और नियामकों की कड़ी जांच के दायरे में ला दिया है। इस घटना में तीन लोगों की मौत हो गई और पांच लापता बताए जा रहे हैं। इसके बाद पर्यावरणविदों और भूवैज्ञानिकों ने इस बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना के निर्माण में अपनाई जा रही सुरक्षा मानकों और साइट प्रबंधन प्रथाओं पर सवाल उठाए हैं।

भूवैज्ञानिक आकलन और प्रबंधन पर सवाल

यह टनल कोझिकोड और वायनाड के बीच कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए बनाई जा रही है। लेकिन, परियोजना के पर्यावरणीय और भूवैज्ञानिक प्रभाव आकलन पर चिंताएं सामने आई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वेल्लारीमाला पर्वत श्रृंखला में टनलिंग के लिए विशेष भूवैज्ञानिक और जल-विज्ञान संबंधी जांच की आवश्यकता होती है, खासकर जब यह क्षेत्र भारी बारिश के दौरान भूस्खलन के प्रति संवेदनशील माना जाता है। यह घटना 2024 में मुंडक्काई-चोरलमाला भूस्खलन स्थल से मात्र पांच किलोमीटर की दूरी पर हुई, जो इस क्षेत्र की अत्यधिक संवेदनशीलता को दर्शाता है।

स्थानीय रिपोर्टों और पर्यावरण समूहों के अवलोकन से पता चलता है कि टनल निर्माण के दौरान निकली मिट्टी के बड़े ढेर एग्जिट पोर्टल के पास जमा किए गए थे। केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (Kerala State Disaster Management Authority) ने मानसून आने से पहले इन मिट्टी के ढेर को हटाने के निर्देश दिए थे, लेकिन कथित तौर पर इन सुरक्षा निर्देशों का पूरी तरह से पालन नहीं किया गया। राज्य सरकार ने मिट्टी के इस अवैज्ञानिक डंपिंग को ही इस तबाही का मुख्य कारण बताया है।

इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर असर

इस आपदा ने जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों और पारिस्थितिक स्थिरता के बीच संतुलन पर बहस छेड़ दी है। आलोचकों का तर्क है कि संवेदनशील इलाकों में परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी (environmental clearances) में पारंपरिक कारकों से आगे बढ़कर जलवायु-संचालित अस्थिरता, जैसे अचानक भारी बारिश की घटनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। अब पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय समुदाय के प्रतिनिधि लंबे समय से चले आ रहे भूवैज्ञानिक जोखिमों की पर्याप्त, स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच के बिना पारंपरिक इंजीनियरिंग पर ध्यान केंद्रित करने पर सवाल उठा रहे हैं।

निवेशकों और हितधारकों के लिए, इस घटना ने परियोजना की समय-सीमा और भविष्य की लागतों के बारे में महत्वपूर्ण अनिश्चितता पैदा कर दी है। निकट भविष्य में नियामकीय निगरानी (regulatory oversight) बढ़ने की संभावना है, जिससे काम रुक सकता है, अतिरिक्त सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य हो सकते हैं, या अधिक महंगी स्थिरीकरण उपायों की आवश्यकता पड़ सकती है। हालांकि इस परियोजना को पहले भी अधिकारियों द्वारा प्राथमिकता दी गई थी, जिसमें सार्वजनिक महत्व के लिए सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृति भी शामिल है, हाल की घटनाओं के कारण नियामकों को कड़े अनुपालन प्रोटोकॉल लागू करने पड़ सकते हैं।

निवेशकों को परियोजना की निरंतरता, इसमें शामिल ठेकेदारों के खिलाफ संभावित कानूनी या प्रशासनिक कार्रवाई, और पश्चिमी घाटों में इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण से संबंधित किसी भी व्यापक नीतिगत बदलाव के बारे में आगामी सरकारी आदेशों पर नजर रखनी चाहिए। परियोजना के निष्पादन में कोई भी देरी लागत वसूली और पूरा होने की अनुमानित समय-सीमा को प्रभावित कर सकती है, जिससे परियोजना की समग्र वित्तीय व्यवहार्यता पर दबाव बढ़ सकता है।

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