अमेरिका की बड़ी एयरलाइंस अब अल्ट्रा-लो फेयर (ultra-low fare) के मॉडल से हटकर प्रीमियम सेवाओं पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। ईंधन और अन्य ऑपरेशनल लागतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के चलते, यह एयरलाइंस अपने मुनाफे को बनाए रखने के लिए यह रणनीति अपना रही हैं।
Detailed Coverage
क्यों बदल रही है एयरलाइंस की रणनीति?
पिछले कई दशकों से अमेरिका में एयरलाइन इंडस्ट्री प्राइस वॉर (price war) और बेहद कम किराए के लिए जानी जाती थी। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। जियोपॉलिटिकल टेंशन और ग्लोबल मार्केट में उथल-पुथल के कारण फ्यूल की कीमतें आसमान छू रही हैं। डेल्टा एयर लाइन्स (Delta Air Lines) के सीईओ एड बैस्टियन (Ed Bastian) के मुताबिक, इंडस्ट्री ने फ्यूल इन्फ्लेशन (fuel inflation) की अभूतपूर्व गति देखी है। इसके अलावा, लेबर कॉस्ट, एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस और एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी लागतें भी बढ़ रही हैं। इन सबको देखते हुए, बजट एयरलाइंस भी अब इतने सस्ते टिकट नहीं रख पा रही हैं कि बिना वित्तीय नुकसान उठाए काम कर सकें।
कैपेसिटी मैनेजमेंट में बड़ा बदलाव
पहले एयरलाइंस मार्केट शेयर बनाए रखने के लिए फ्लाइट्स को फुल रखने पर जोर देती थीं, भले ही इसके लिए उन्हें टिकटों की कीमतें घटानी पड़ें। लेकिन अब यह ट्रेंड बदल गया है। यूनाइटेड एयरलाइंस (United Airlines) के सीएफओ माइक लेस्किन (Mike Leskinen) ने कहा है कि कंपनियां अब ऐसे रूट्स पर फ्लाइट कैपेसिटी (flight capacity) कम करने को तैयार हैं जो आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं हैं। इसका मतलब है कि एयरलाइंस वॉल्यूम से ज्यादा प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) को प्राथमिकता दे रही हैं। यह कदम उन प्राइस वॉर को रोकने के लिए उठाया जा रहा है जिन्होंने इंडस्ट्री की कमाई को ऐतिहासिक रूप से नुकसान पहुंचाया है।
प्रीमियम ऑफरिंग्स पर फोकस
डेल्टा और यूनाइटेड जैसी बड़ी एयरलाइंस अपनी प्रीमियम ट्रैवल एक्सपीरियंस (premium travel experience) देने की क्षमता का फायदा उठा रही हैं। बेहतर केबिन सीटिंग, अपग्रेडेड लाउंज एक्सेस और बेहतर इन-फ्लाइट टेक्नोलॉजी जैसी सुविधाओं में निवेश करके, ये एयरलाइंस अमीर यात्रियों को टारगेट कर रही हैं जो कीमतों के प्रति कम संवेदनशील होते हैं। इस प्रीमियम सेगमेंट से होने वाली कमाई एयरलाइंस को स्टैंडर्ड फ्लाइट्स के ऑपरेशनल खर्च को बेहतर ढंग से मैनेज करने में मदद करती है, जिससे आर्थिक अनिश्चितता के दौर में कमाई का एक स्थिर जरिया बनता है।
बजट एयरलाइंस के लिए जोखिम
जहां एक तरफ लेगेसी एयरलाइंस अपनी रणनीति बदल रही हैं, वहीं बजट एयरलाइंस के लिए स्थिति और मुश्किल होती जा रही है। फ्रंटियर ग्रुप (Frontier Group) और जेटब्लू (JetBlue) जैसी कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है। इन कंपनियों के मार्जिन पतले हैं और बढ़ती लागतों को झेलने की क्षमता कम है। इंडस्ट्री इस बात पर नजर रखे हुए है कि क्या ये बजट एयरलाइंस अपने बिजनेस मॉडल को सफलतापूर्वक बदल पाती हैं या फिर उन्हें स्पिरिट एयरलाइंस (Spirit Airlines) जैसी कंपनियों की तरह गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ता है। निवेशकों के लिए अगली अहम जानकारी तिमाही नतीजों (quarterly earnings guidance) से मिलेगी, जिससे पता चलेगा कि ये एयरलाइंस बदलती कंज्यूमर डिमांड के बीच अपनी लागतों को कितनी प्रभावी ढंग से मैनेज कर पा रही हैं।
