भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी स्कीम UDAN के आधे से ज़्यादा रूट्स बंद हो गए हैं। छोटे एयरलाइन्स के लिए ऑपरेशनल लागत उठाना मुश्किल हो रहा है। अब **28,840 करोड़** के नए फेज में क्या बढ़ी हुई सब्सिडी और सपोर्ट से ये दिक्कतें दूर होंगी?
क्या हुआ?
'उड़े देश का आम नागरिक' (UDAN) यानी भारत की क्षेत्रीय एयर कनेक्टिविटी योजना मुश्किलों में घिर गई है। 2017 में लॉन्च होने के बाद से अब तक 669 रूट्स शुरू किए गए थे, लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इनमें से सिर्फ 336 रूट्स ही अभी एक्टिव हैं। सरकार अब तक सब्सिडी और एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब ₹4,700 करोड़ और ₹4,800 करोड़ खर्च कर चुकी है। इसके बावजूद, इतने सारे रूट्स का बंद होना यह दिखाता है कि रीजनल एयर ट्रैफिक को लगातार चालू रखना कितना कठिन है। अब इस स्कीम का नया फेज ₹28,840 करोड़ के बड़े बजट के साथ शुरू होने वाला है, जिसका मकसद रीजनल ऑपरेटर्स को ज़्यादा फाइनेंशियल सपोर्ट देना है।
सब्सिडी और वायबिलिटी की चुनौती
रीजनल एयरलाइन्स के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जब सरकार की शुरुआती 3 साल की सब्सिडी खत्म हो जाती है, तो ऑपरेशनल कॉस्ट निकालना मुश्किल हो जाता है। छोटे शहरों के कई रूट्स, जैसे कि बिदार और कालाबुरागी को जोड़ने वाले रूट्स, बिना लगातार सरकारी मदद के कमर्शियल तौर पर फायदे में नहीं रहे। सरकार इस बार इस समस्या को हल करने के लिए सब्सिडी पीरियड को 3 साल से बढ़ाकर 5 साल करने और सब्सिडी का कुल बजट ₹10,000 करोड़ तक बढ़ाने का सोच रही है। इन कदमों का मकसद एयरलाइन्स को कम पैसेंजर ट्रैफिक वाले समय में मदद करना है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और रेगुलेटरी अड़चनें
पैसों की सब्सिडी के अलावा, रीजनल एयरलाइन्स को कई लॉजिस्टिकल दिक्कतें भी झेलनी पड़ रही हैं। कई रीजनल एयरपोर्ट्स पर काम तय समय पर शुरू नहीं हो पाता, जिसका मुख्य कारण रेगुलेटरी अड़चनें और भारी कंप्लायंस कॉस्ट है। ऐसे में, एयरलाइन्स के पास रूट्स तो होते हैं, लेकिन वे वहां उतर या उड़ नहीं पातीं, जिससे उनका पैसा बर्बाद होता है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े एयरपोर्ट्स पर स्लॉट्स (लैंडिंग और टेक-ऑफ की इजाजत) मिलना रीजनल ऑपरेशंस को फायनेंशियल तौर पर सफल बनाने के लिए बहुत जरूरी है। बड़े बिजनेस और ट्रांजिट हब से लगातार कनेक्टिविटी के बिना, छोटी एयरलाइन्स ऐसा नेटवर्क नहीं बना पातीं जो पर्याप्त पैसेंजर्स को आकर्षित कर सके और उन्हें प्रॉफिटेबल बनाए रख सके।
एयरक्राफ्ट की उपलब्धता और ऑपरेशनल रिस्क
इंडस्ट्री को एयरक्राफ्ट की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। लीजिंग कंपनियां छोटी रीजनल एयरलाइन्स को लोन देने में हिचकिचाती हैं, जिससे बेड़े (fleet) का विस्तार मुश्किल हो जाता है। इसे दूर करने के लिए, इंडस्ट्री में यह सुझाव दिए जा रहे हैं कि सरकार खुद एयरक्राफ्ट लीजिंग मॉडल या सरकारी गारंटी वाले मॉडल लाए, ताकि नई और छोटी एयरलाइन्स बाजार में आ सकें। एविएशन और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में इन्वेस्टर्स के लिए यह रिस्क बना हुआ है कि ज़्यादा सब्सिडी मिलने के बावजूद, एयरक्राफ्ट की कमी और एयरपोर्ट्स पर भीड़भाड़ की वजह से प्रोजेक्ट में देरी हो सकती है और नए फंड का असर कम हो सकता है।
इन्वेस्टर्स को क्या देखना चाहिए?
रीजनल एविएशन और एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कंपनियों पर नजर रखने वाले इन्वेस्टर्स को कुछ अहम इंडिकेटर्स पर ध्यान देना चाहिए। इनमें नए रीजनल एयरपोर्ट्स के चालू होने की असली तारीख, छोटी एयरलाइन्स की एयरक्राफ्ट लीज हासिल करने की क्षमता, और बड़े मेट्रो शहरों के एयरपोर्ट्स पर स्लॉट अलॉटमेंट से जुड़े किसी भी पॉलिसी बदलाव की निगरानी शामिल है। इसके अलावा, नई सब्सिडी स्ट्रक्चर की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या इससे पैसेंजर डिमांड में स्थायी बढ़ोतरी होती है, या 5 साल का सपोर्ट पीरियड खत्म होने के बाद भी एयरलाइन्स को संघर्ष करना पड़ता है।
