तमिलनाडु सरकार के कोयंबटूर और मदुरै में मेट्रो रेल विस्तार के प्लान को केंद्र सरकार से बार-बार झटका मिल रहा है। केंद्र ने मेट्रो के बजाय किफायती 'बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम' (BRTS) पर जोर देने की सलाह दी है, जबकि राज्य सरकार का पूरा ध्यान फिलहाल चेन्नई मेट्रो फेज-II को पूरा करने पर है।
मेट्रो बनाम बस: क्या है विवाद?
तमिलनाडु के अर्बन ट्रांसपोर्ट मॉडर्नाइजेशन के प्लान को लेकर राज्य और केंद्र के बीच ठन गई है। कोयंबटूर और मदुरै जैसे शहरों के लिए राज्य सरकार मेट्रो रेल कॉरिडोर बनाना चाहती है, लेकिन केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने इन प्रस्तावों को बार-बार खारिज कर दिया है। जुलाई 2026 में आए हालिया फैसले में केंद्र ने साफ कहा कि इन शहरों की आबादी और जरूरत के हिसाब से BRTS (बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम) ज्यादा सस्टेनेबल और सस्ता विकल्प है।
चेन्नई मेट्रो पर भारी निवेश का बोझ
यह खींचतान ऐसे समय में हो रही है जब राज्य सरकार पहले से ही चेन्नई मेट्रो फेज-II के भारी-भरकम प्रोजेक्ट में फंसी है। इस प्रोजेक्ट की कुल लागत ₹63,246 करोड़ है। अच्छी बात यह है कि इसका 50% से ज्यादा काम पूरा हो चुका है और उम्मीद है कि साल 2026 के अंत तक इसके कुछ हिस्से चालू हो जाएंगे। इसके अलावा, CMRL (चेन्नई मेट्रो रेल लिमिटेड) अब मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (MRTS) के ऑपरेशन्स को भी अपने हाथ में ले रही है ताकि ट्रांसपोर्ट का एक यूनिफाइड मैनेजमेंट बन सके।
वित्तीय अनुशासन और भविष्य की राह
राज्य की वित्तीय स्थिति को देखते हुए बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की समीक्षा की जा रही है। इसका एक उदाहरण परंदूर (Parandur) में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट प्रोजेक्ट का रद्द होना है, जिसे अगस्त 2026 के अंत में लिया गया था। इंफ्रास्ट्रक्चर और इंजीनियरिंग कंपनियों के लिए यह साफ संकेत है कि अब किसी भी बड़े प्रोजेक्ट को वित्तीय दक्षता (Financial Efficiency) की कसौटी पर परखा जाएगा। फिलहाल, निवेशकों की नजरें चेन्नई मेट्रो की डेडलाइन और राज्य सरकार के नए ट्रांसपोर्ट मॉडल पर टिकी हैं।
