E-Bus Tender: सॉफ्टवेयर और फिल्म कंपनियां भी दौड़ में, सरकारी E-Bus कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए लगी होड़

TRANSPORTATION
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AuthorNeha Patil|Published at:
E-Bus Tender: सॉफ्टवेयर और फिल्म कंपनियां भी दौड़ में, सरकारी E-Bus कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए लगी होड़

PM-eBus Sewa स्कीम के तहत **3,604** इलेक्ट्रिक बसों के कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए अब गैर-ऑटोमोबाइल कंपनियां भी बोली लगा रही हैं। सॉफ्टवेयर और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी ये फर्में टाटा मोटर्स और JBM जैसी कंपनियों के साथ पार्टनरशिप कर ट्रांसपोर्ट सेक्टर में एंट्री कर रही हैं, जिसे **₹20,000 करोड़** की सरकारी सब्सिडी का सपोर्ट है।

सरकारी 'PM-eBus Sewa' पहल में चौंकाने वाले खिलाड़ी सामने आए हैं। सॉफ्टवेयर डेवलपर्स और फिल्म प्रोडक्शन हाउस ने 3,604 इलेक्ट्रिक बसों के संचालन के लिए टेंडर भरे हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये कंपनियां खुद बसें नहीं बनाएंगी, बल्कि ये 'ऑपरेटर' की भूमिका में होंगी। ये फर्में टाटा मोटर्स और JBM जैसी दिग्गज मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के साथ स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप कर रही हैं, जो बसों की सप्लाई और मेंटेनेंस का जिम्मा संभालेंगी।

क्या है 'Gross Cost Contract' मॉडल?

ये कंपनियां इस सेक्टर में इसलिए आ पा रही हैं क्योंकि टेंडर 'Gross Cost Contract' (GCC) या पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर आधारित है। यहां टेंडर मैन्युफैक्चरिंग का नहीं, बल्कि 'सर्विस प्रोविजन' का है। बोली लगाने वाली कंपनी का मुख्य काम बसों का इंतजाम करना, ड्राइवर रखना और डेली ऑपरेशंस देखना है। जिनके पास पूंजी है और भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर है, वे बिना ऑटो-एक्सपर्टाइज के भी इस बिजनेस में कदम रख सकती हैं।

कमाई और सब्सिडी का गणित

इस प्रोजेक्ट को ₹20,000 करोड़ का सरकारी फंड सपोर्ट कर रहा है। सरकार ने प्रति किलोमीटर पेमेंट फिक्स कर दिया है:

  • 12-मीटर की स्टैंडर्ड बस के लिए ₹24 प्रति किमी।
  • 9-मीटर बस के लिए ₹22 प्रति किमी।
  • 7-मीटर मिनी बस के लिए ₹20 प्रति किमी।

यह 'एन्युटी-स्टाइल' रिवेन्यू मॉडल कंपनियों को एक फिक्स्ड इनकम का भरोसा देता है, बशर्ते वे ऑपरेशनल टारगेट पूरे करें।

रिस्क फैक्टर को न करें इग्नोर

निवेशकों को यह समझना होगा कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट चलाना सॉफ्टवेयर कोडिंग या फिल्म मेकिंग से बिल्कुल अलग है। इसमें चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, ड्राइवर मैनेजमेंट और व्हीकल मेंटेनेंस जैसे जटिल काम शामिल हैं। सबसे बड़ा जोखिम स्टेट ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग्स की तरफ से पेमेंट में देरी का रहता है। यदि सरकारी एजेंसियों के पास फंड की कमी हुई, तो कैश फ्लो में दबाव आ सकता है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि इन कॉन्ट्रैक्ट्स का फाइनल अलॉटमेंट कैसे होता है और मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स का क्या रुख रहता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.