सड़क मंत्रालय का बड़ा कदम: कम कीमत पर हाईवे बनाने वाली कंपनियों को अब देनी होगी ज्यादा सिक्योरिटी

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AuthorAditya Rao|Published at:
सड़क मंत्रालय का बड़ा कदम: कम कीमत पर हाईवे बनाने वाली कंपनियों को अब देनी होगी ज्यादा सिक्योरिटी

सड़क मंत्रालय (Road Ministry) अब ऐसी कंपनियों के लिए नियम कड़े करने की तैयारी में है जो सरकारी हाईवे प्रोजेक्ट्स के अनुमानित खर्च से **30%** कम कीमत पर बोली लगाती हैं। इस कदम का मकसद अत्यधिक कम बोली (underbidding) को रोकना है, जिससे अक्सर प्रोजेक्ट में देरी और कंपनी की आर्थिक हालत कमजोर हो जाती है।

हाईवे बनाने के लिए कड़े नियम

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (Ministry of Road Transport and Highways) इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अत्यधिक कम बोली लगाने की समस्या से निपटने के लिए एक नई वित्तीय व्यवस्था ला रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि सिर्फ मजबूत वित्तीय स्थिति वाली कंपनियां ही बड़े हाईवे प्रोजेक्ट्स को हाथ में लें। इसके लिए, मंत्रालय अनुमानित लागत से काफी कम बोली लगाने पर अतिरिक्त प्रदर्शन सुरक्षा (Additional Performance Security - APS) की मांग बढ़ाएगा। यह कदम प्रोजेक्ट्स के बीच में अटकने, विवादों और लागत बढ़ने जैसी समस्याओं को कम करने के लिए उठाया जा रहा है।

नई सिक्योरिटी का क्या होगा असर?

प्रस्तावित नियमों के अनुसार, अगर किसी कंपनी की बोली अनुमानित लागत से 30% ज्यादा कम है, तो उसे अतिरिक्त प्रदर्शन सुरक्षा देनी होगी। हर 1% अतिरिक्त डिस्काउंट पर कंपनी को स्टैंडर्ड 3% परफॉर्मेंस गारंटी के अलावा 0.5% और सिक्योरिटी जमा करनी होगी।

  • उदाहरण के लिए, अगर कोई बोली 40% कम है, तो कुल सिक्योरिटी करीब 11% तक जा सकती है (जो अभी के 8% के मुकाबले ज्यादा है)।
  • वहीं, 60% तक की आक्रामक बोली पर सिक्योरिटी 21% तक पहुँच सकती है।

एग्जीक्यूशन और वित्तीय जोखिमों को कम करने की कोशिश

मंत्रालय की आंतरिक समीक्षाओं से पता चलता है कि टेंडर के समय भले ही ज्यादा डिस्काउंट फायदेमंद लगे, लेकिन बाद में कंपनी की आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ जाती है। निर्माण सामग्री की बढ़ती कीमतों और पैसों की तंगी के चलते, बहुत कम कीमत पर प्रोजेक्ट लेने वाली कंपनियां काम की रफ्तार बनाए रखने में संघर्ष करती हैं। इससे अक्सर प्रोजेक्ट में बदलाव या देरी की नौबत आती है, जो नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) जैसे सरकारी निकायों के लिए मुश्किलें खड़ी करती है।

इसके अलावा, नई व्यवस्था में सिक्योरिटी की वापसी (release) प्रोजेक्ट के अलग-अलग चरणों से जोड़ी जाएगी। कुछ पैसा तय समय पर प्रोजेक्ट पूरा होने पर मिलेगा, जबकि बाकी पैसा सड़क की क्वालिटी और डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड (defect liability period) के सफल समापन के बाद जारी किया जाएगा। इस तरह, कंपनी का पैसा सीधे सड़क की क्वालिटी और परफॉर्मेंस से जुड़ जाएगा।

इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए क्या हैं मायने?

इस नीतिगत बदलाव से सड़क निर्माण उद्योग में प्रतिस्पर्धा का तरीका बदलने की उम्मीद है। बड़ी कंपनियों के पास ज्यादा कैश रिजर्व और आसानी से क्रेडिट मिलने की वजह से वे इन बढ़ी हुई पूंजी की जरूरतों को पूरा कर पाएंगी। वहीं, छोटी या कर्ज में डूबी कंपनियां बैंक गारंटी हासिल करने में मुश्किल महसूस कर सकती हैं। इससे यह संभव है कि ऑर्डर बुक बेहतर पूंजी वाली कंपनियों के हाथ में सिमट जाए। निवेशकों को यह देखना होगा कि पूंजी की इन बढ़ी हुई जरूरतों का बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों के मार्जिन और कैश फ्लो पर क्या असर पड़ता है, क्योंकि गारंटी न दे पाने की स्थिति में कुछ कंपनियां नए प्रोजेक्ट्स के लिए बोली नहीं लगा पाएंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.