सड़क निर्माण कंपनियों की मांग: कच्चे माल की कीमतों पर लगे 'फ्लोर प्राइस', इंफ्रा लागत में 30% का उछाल

TRANSPORTATION
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AuthorAditya Rao|Published at:
सड़क निर्माण कंपनियों की मांग: कच्चे माल की कीमतों पर लगे 'फ्लोर प्राइस', इंफ्रा लागत में 30% का उछाल
Overview

नेशनल हाईवे बनाने वाली कंस्ट्रक्शन कंपनियां ईंधन (Fuel) और बिटुमेन (Bitumen) की कीमतों पर 'स्टार रेट' यानी न्यूनतम मूल्य तय करने की मांग कर रही हैं। लागत में **30%** की भारी बढ़ोतरी हो चुकी है और **₹42,450 करोड़** के प्रोजेक्ट्स पर इसका खतरा मंडरा रहा है। इंडस्ट्री का कहना है कि मौजूदा बिडिंग मॉडल कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में हो रहे भारी उतार-चढ़ाव को ध्यान में नहीं रखते, जिससे प्रोजेक्ट्स का भविष्य खतरे में है।

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क्या है वैल्यूएशन का अंतर?

इंफ्रास्ट्रक्चर कंस्ट्रक्शन कंपनियों को प्रोजेक्ट एस्टीमेट (Project Estimate) और मार्केट की असलियत के बीच एक बड़ा गैप झेलना पड़ रहा है। नेशनल हाईवे बिल्डर्स फेडरेशन (NHBF) ने सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय से अपनी अपील तेज कर दी है। उनका कहना है कि आठ बड़ी परियोजनाओं, जिनकी कुल वैल्यू ₹42,450 करोड़ से ज्यादा है, के मौजूदा बिडिंग प्रोसेस में कमोडिटी (Commodity) की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को ठीक से नहीं आंका गया है।

हालांकि, प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स पुराने इकोनॉमिक एजंपशन (Economic Assumption) के आधार पर बनाई गई थीं, लेकिन पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में 30% की अचानक हुई बढ़ोतरी ने शुरुआती लागत-लाभ (Cost-Benefit) गणनाओं को बेकार कर दिया है। पूर्व-निर्धारित 'स्टार रेट' (Star Rate) के बिना, कंस्ट्रक्शन कंपनियों का तर्क है कि मौजूदा टेंडरिंग प्रोसेस में या तो बहुत कम बोली लगाने वाले आएंगे जो प्रोजेक्ट को पूरा नहीं कर पाएंगे, या फिर कंपनियां अनियंत्रित महंगाई के रिस्क को उठाने से इनकार कर देंगी, जिससे प्रोजेक्ट्स ठप पड़ सकते हैं।

गहराई से विश्लेषण

बिटुमेन, जो भारी कच्चे तेल से बनता है और सड़क निर्माण में बाइंडर (Binder) के तौर पर इस्तेमाल होता है, उसकी कीमतें भारत में पिछले कुछ महीनों में ₹80,000 से ₹1,00,000 प्रति टन तक पहुंच गई हैं। यह कीमतें स्टैंडर्ड डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स (Detailed Project Reports) में किए गए अनुमानों से काफी ज्यादा हैं। इसकी वजह से उन बिडर्स (Bidders) को नुकसान हो रहा है जो मौजूदा मार्केट रेट पर मैटेरियल की कीमत लगा रहे हैं, जबकि कुछ भविष्य में तेल की कीमतों में नरमी की उम्मीद कर रहे हैं।

पहले इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियां इन झटकों को झेलने के लिए इंटरनल इंडेक्सेशन (Internal Indexation) पर निर्भर रहती थीं, लेकिन सप्लाई-साइड की मौजूदा दिक्कतें, लॉजिस्टिकल बाधाएं और कच्चे तेल के सोर्सिंग में बदलाव के कारण पारंपरिक तरीके अब काम नहीं कर रहे हैं। पिछली बार की तरह नहीं, जब कंस्ट्रक्शन कंपनियां मामूली उतार-चढ़ाव को झेल सकती थीं, वहीं मौजूदा सप्लाई का दबाव, खासकर हाई-ग्रेड VG-40 बिटुमेन के मामले में, EPC (Engineering, Procurement, and Construction) और हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (Hybrid Annuity Model - HAM) दोनों के मार्जिन पर भारी दबाव डाल रहा है।

गंभीर चिंताएं (Forensic Bear Case)

'स्टार रेट' के प्रस्ताव के आलोचक इसे सरकारी खरीद के मूल सिद्धांत के खिलाफ मानते हैं। इनपुट रेट्स को फिक्स करने से, इंडस्ट्री असल में एक 'कॉस्ट-प्लस हाइब्रिड' (Cost-Plus Hybrid) मॉडल की मांग कर रही है, जो ठेकेदारों के जोखिम को कम करेगा लेकिन सरकार पर वित्तीय बोझ बढ़ा सकता है। यह मांग इसी कड़ी में है जहां बिल्डरों और सरकार के बीच ₹10 करोड़ से अधिक के विवादों में आर्बिट्रेशन (Arbitration) पर लगी रोक को लेकर एक बड़ी लड़ाई चल रही है।

अगर मंत्रालय फिक्स रेट की मांग मान लेता है, तो यह एक 'मोरल हैज़र्ड' (Moral Hazard) पैदा कर सकता है, जहां ठेकेदारों का सप्लाई चेन प्रोक्योरमेंट में ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) लाने का प्रोत्साहन कम हो जाएगा। इसके अलावा, वेरिएबल मार्केट गुड्स (Variable Market Goods) के लिए फिक्स रेट्स पर निर्भरता सरकार को महंगे सौदों में फंसा सकती है, अगर तेल की कीमतें अचानक गिरती हैं, तो इसका वित्तीय बोझ प्राइवेट सेक्टर से पब्लिक एक्सचेकर (Public Exchequer) पर शिफ्ट हो जाएगा।

भविष्य का अनुमान

जून 2026 तक, बिडिंग पाइपलाइन आक्रामक बनी हुई है, जिसमें मई में NHAI की टेंडरिंग एक्टिविटी (Tendering Activity) 18 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई थी। सेक्टर द्वारा एक स्टैंडर्डइज्ड बेस रेट (Standardized Base Rate) की मांग मौजूदा प्रोजेक्ट अवार्ड स्पीड (Project Award Speed) की स्थिरता को लेकर गहरी चिंता को दर्शाती है। यदि मैक्रोइकोनॉमिक अस्थिरता (Macroeconomic Volatility) के अनुरूप कॉन्ट्रैक्ट टर्म्स (Contract Terms) को अलाइन करने वाला कोई सेक्टर-स्पेसिफिक कैलिब्रेशन (Sector-Specific Calibration) नहीं अपनाया गया, तो इस बात का महत्वपूर्ण जोखिम है कि आने वाले टेंडरों में कम भागीदारी होगी या फिर अधिक मुकदमेबाजी देखने को मिलेगी, जिससे इस वित्तीय वर्ष के बाकी बचे समय में भारत के सड़क नेटवर्क का विस्तार धीमा पड़ सकता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.