Quick Commerce का जलवा! डेयरी सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव, बदलेंगे बिजनेस के नियम

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Quick Commerce का जलवा! डेयरी सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव, बदलेंगे बिजनेस के नियम

भारत में क्विक कॉमर्स (Quick Commerce) के तेज़ी से बढ़ते चलन ने डेयरी प्रोडक्ट्स की सप्लाई चेन को पूरी तरह से बदल दिया है। अब बड़े लॉट की बजाय छोटे-छोटे ऑर्डर बार-बार डिलीवर हो रहे हैं, जिससे कंपनियों को अपनी लॉजिस्टिक्स और प्रोडक्ट स्ट्रेटेजी पर नए सिरे से सोचना पड़ रहा है।

बदलती है लॉजिस्टिक्स की रफ्तार

क्विक कॉमर्स के आने से पहले, डेयरी कंपनियां बड़े लॉट में, कम बार डिलीवरी करती थीं ताकि प्रति यूनिट ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट कम रहे। लेकिन अब 'डार्क स्टोर्स' (hyper-local fulfillment centers) के ज़रिए, रिटेलर्स तेज़ी और प्रोडक्ट की फ्रेशनेस को प्राथमिकता दे रहे हैं। इन स्टोर्स में जगह कम होती है, इसलिए अब डेयरी ब्रांड्स को भारी शिपमेंट की बजाय दिन में कई बार छोटे-छोटे ऑर्डर डिलीवर करने पड़ रहे हैं।

हालांकि इससे ट्रिप्स की संख्या और हैंडलिंग बढ़ गई है, पर कंपनियां समझ रही हैं कि स्टॉक-आउट (stock-out) होने पर ग्राहक खोने का नुकसान, ज़्यादा लॉजिस्टिक्स खर्च से कहीं ज़्यादा है। इसलिए, अब 'फुल-ट्रकलोड' (full-truckload) एफिशिएंसी से ज़्यादा 'ऑन-टाइम-इन-फुल' (on-time-in-full) डिलीवरी पर फोकस बढ़ गया है।

प्रोडक्ट सिलेक्शन और डिजिटल पहचान

क्विक कॉमर्स ऐप्स के डिजिटल होने से प्रोडक्ट स्ट्रेटेजी भी बदल रही है। ये ऐप्स ग्राहकों के लिए प्रोडक्ट खोजने का मुख्य जरिया बन गए हैं। ऐसे में, कंपनियां अब बड़े कैटलॉग की बजाय लोकल डिमांड के पैटर्न के हिसाब से प्रोडक्ट्स चुन रही हैं। डेटा की मदद से हाई-वेलोसिटी वाले आइटम और खास प्रोडक्ट्स जैसे हाई-प्रोटीन पनीर या लैक्टोज-फ्री दूध को स्टॉक किया जा रहा है, जिन्हें शायद लोकल दुकानों में इतनी पहचान न मिले। जिन ब्रांड्स की डिजिटल उपलब्धता लगातार बनी रहती है, वे बाज़ार में आगे निकल जाती हैं, क्योंकि क्विक कॉमर्स ग्राहक अक्सर पसंदीदा ब्रांड के स्टॉक में न होने पर दूसरा विकल्प चुन लेते हैं।

ऑपरेशनल और फाइनेंशियल चुनौतियां

बार-बार होने वाली छोटी डिलीवरी में कोल्ड-चेन (cold-chain) बनाए रखना एक बड़ी ऑपरेशनल चुनौती है। कंपनियों को व्हीकल की शेड्यूलिंग को मैनेज करना होता है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होता है कि दूध और दही जैसे प्रोडक्ट्स अपनी यात्रा के दौरान सही तापमान पर रहें। इसके अलावा, इस मॉडल की फाइनेंशियल सस्टेनेबिलिटी (financial sustainability) निवेशकों के लिए एक अहम पहलू है। लॉजिस्टिक्स की बढ़ी हुई फ्रीक्वेंसी प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकती है, जब तक कि कंपनियां खास प्रोडक्ट्स पर प्रीमियम प्राइसिंग या बेहतर इन्वेंट्री टर्नओवर से इन खर्चों को बैलेंस न कर पाएं।

निवेशकों को आने वाली अर्निंग रिपोर्ट्स में यह देखना होगा कि डेयरी कंपनियां इन ट्रांजिशन कॉस्ट्स को कैसे मैनेज करती हैं। मुख्य बातों में फ्रीक्वेंट डिलीवरी मॉडल का ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर, बिना ज़्यादा बर्बादी के कोल्ड-चेन क्वालिटी बनाए रखने की क्षमता और क्विक कॉमर्स ऐप इकोसिस्टम में प्रीमियम प्रोडक्ट की लॉन्चिंग की सफलता शामिल है। जो कंपनियां इन मिनट-टू-मिनट की डिमांड के हिसाब से अपनी सप्लाई चेन को सफलतापूर्वक ढाल लेंगी, वे बड़ा मार्केट शेयर हासिल कर सकती हैं। वहीं, जो ऑपरेशनल इंटेंसिटी से जूझेंगी, उनके मुनाफे पर दबाव आ सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.