नए भारतीय एयरपोर्ट्स पर विदेशी एयरलाइंस को लुभाना मुश्किल, फीस बनी बड़ी बाधा

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AuthorAditya Rao|Published at:
नए भारतीय एयरपोर्ट्स पर विदेशी एयरलाइंस को लुभाना मुश्किल, फीस बनी बड़ी बाधा

नवी मुंबई और नोएडा के नए अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट विदेशी एयरलाइंस को आकर्षित करने में संघर्ष कर रहे हैं। इसकी मुख्य वजह है यूजर डेवलपमेंट फीस (UDF) का बहुत ज्यादा होना, जो दिल्ली और मुंबई जैसे पुराने एयरपोर्ट्स से भी काफी ज्यादा है। यह लागत विदेशी कंपनियों को परिचालन (Operations) के लिहाज से महंगा पड़ रहा है।

नई एयरपोर्ट्स पर विदेशी उड़ानों को लाने में आ रही हैं मुश्किलें

नवी मुंबई और नोएडा में बने नए अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट्स को विदेशी एयरलाइंस के लिए आकर्षक बनाना एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है एयरपोर्ट पर लगने वाली यूजर डेवलपमेंट फीस (UDF) और अन्य एयरोनॉटिकल चार्ज, जो दिल्ली और मुंबई के पुराने और स्थापित एयरपोर्ट्स के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं।

फीस का गणित कैसे बिगाड़ रहा खेल?

विदेशी एयरलाइंस के लिए किसी रूट पर उड़ान शुरू करना लागत और कमाई का सीधा हिसाब-किताब होता है। जब वे किसी एयरपोर्ट को अपना हब (Hub) चुनती हैं, तो वे ऐसे एयरपोर्ट की तलाश करती हैं जहाँ उनका परिचालन खर्च कम हो और साथ ही, कनेक्टिंग फ्लाइट्स का एक बड़ा नेटवर्क उपलब्ध हो। नए एयरपोर्ट्स को बनाने में लगे भारी-भरकम पैसों की वसूली के लिए उन पर ऊँची फीस लगाई गई है।

  • नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Noida International Airport) पर अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए UDF ₹980 तय की गई है, जो दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट की ₹650 की फीस से 51% ज्यादा है।
  • नवी मुंबई की बात करें तो यहाँ अंतरराष्ट्रीय UDF ₹1,225 है, जो मुंबई के मुख्य एयरपोर्ट के ₹615 के मुकाबले लगभग दोगुनी है।

'हब-एंड-स्पोक' मॉडल का क्या होगा?

विदेशी एयरलाइंस 'हब-एंड-स्पोक' मॉडल पर काम करती हैं, जिसमें वे यात्रियों को एक केंद्रीय एयरपोर्ट पर लाती हैं और फिर उन्हें देश के दूसरे शहरों के लिए कनेक्ट करती हैं। वे एक ही एयरपोर्ट पर अपने ऑपरेशन्स को केंद्रित करना पसंद करती हैं ताकि विमानों का बेहतर इस्तेमाल हो सके और ग्राउंड स्टाफ की कार्यक्षमता बढ़े। ऐसे में, एक ही शहर के दूसरे एयरपोर्ट पर शिफ्ट होने का मतलब है कि एयरलाइंस को अपने स्टाफ, इंजीनियरिंग और ग्राउंड हैंडलिंग टीमों को दो जगहों पर बांटना होगा, जिससे परिचालन और जटिल हो जाएगा और लागत बढ़ जाएगी।

घरेलू एयरलाइंस और यात्रियों पर असर

एयरपोर्ट इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी (AERA) द्वारा तय की गई इन फीस पर इंडिगो (IndiGo) और एयर इंडिया (Air India) जैसी बड़ी घरेलू एयरलाइंस ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि इन ऊँची फीस के कारण टिकट महंगे होंगे, जिससे यात्रियों की मांग पर असर पड़ सकता है। वहीं, नए एयरपोर्ट्स के ऑपरेटरों का कहना है कि इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के बाद यह फीस उनकी लंबी अवधि की वित्तीय व्यवहार्यता (Financial Viability) के लिए जरूरी है।

निवेशकों के लिए क्या है मायने?

यह स्थिति नए ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट्स के ऑपरेटरों के लिए एक बड़ा स्ट्रक्चरल रिस्क (Structural Risk) पैदा करती है। अगर वे पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक नहीं खींच पाते हैं, तो निवेश की लागत की भरपाई का बोझ घरेलू एयरलाइंस और यात्रियों पर ही पड़ेगा, जिसके परिणामस्वरूप उम्मीद से कम उड़ानें हो सकती हैं।

निवेशकों और बाजार पर नजर रखने वालों के लिए, आने वाली तिमाहियों में ट्रैफिक डेटा और लोड फैक्टर (Load Factor) पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। इन नए एयरपोर्ट्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे विदेशी एयरलाइंस के लिए जरूरी 'पैसेंजर फीड' बनाने के लिए घरेलू कनेक्टिविटी में कितना सुधार कर पाते हैं, या फिर उन्हें स्थापित हब से बेहतर प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपनी मूल्य निर्धारण रणनीति (Pricing Strategy) को समायोजित करना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.