इंसेंटिव-ड्रिवन दांव
दिल्ली-एनसीआर में पुराने, प्रदूषण फैलाने वाले कमर्शियल वाहनों के चक्र को तोड़ने के लिए केंद्रीय कैबिनेट की नई पहल एक बड़ा दांव है। सरकार करीब 2 लाख वाहनों को बदलने के लिए ₹5,041 करोड़ आवंटित कर रही है। यह उम्मीद की जा रही है कि ब्याज सब्सिडी, फ्यूल वाउचर और टैक्स छूट पुराने वाहनों के मालिकों को नए वाहन अपनाने के लिए मना लेंगे। लेकिन, कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में ऐतिहासिक रूप से मांग-आपूर्ति का अंतर रहा है। पुराने एमिशन-कम्प्लायंट वाहनों की ऊंची लागत अक्सर फ्यूल एफिशिएंसी से होने वाले मामूली फायदे को खत्म कर देती है, जिससे पिछली रिप्लेसमेंट कोशिशें धीमी पड़ गई थीं।
स्ट्रक्चरल वैल्यूएशन गैप
पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट के विपरीत, जहां रिटेल डिमांड में लचीलापन होता है, कमर्शियल व्हीकल मार्केट सीधे औद्योगिक उत्पादन और माल ढुलाई दरों से जुड़ा है। Tata Motors और Ashok Leyland जैसी कंपनियां 'रिप्लेसमेंट साइकिल' को बढ़ावा देने के लिए स्क्रैपेज इंसेंटिव की मांग करती रही हैं। लेकिन, पिछला डेटा बताता है कि फ्लीट मालिक BS-VI या इलेक्ट्रिक प्लेटफॉर्म पर जाने को एक न्यूट्रल या यहां तक कि निगेटिव कदम मानते हैं। 100% मोटर व्हीकल टैक्स कंसेशन के बावजूद, आधुनिक, कम्प्लायंट फ्लीट के लिए भारी शुरुआती कैपिटल एक्सपेंडिचर एक बड़ी बाधा है। इसके अलावा, फॉर्मल स्क्रैपिंग सुविधाओं का अविकसित नेटवर्क लॉजिस्टिक्स में और मुश्किलें पैदा करता है। एक मैंडेटरी और सख्ती से लागू होने वाली एंड-ऑफ-लाइफ व्हीकल पॉलिसी के बिना, अनौपचारिक स्क्रैप मार्केट, जो अक्सर कम लागत पर चलता है, जारी रहने की संभावना है, जो सरकार के पर्यावरण उद्देश्यों को कमजोर करेगा।
फॉरेंसिक बियर केस
इस पहल के लिए सबसे बड़ा जोखिम इसकी वॉलंटरी प्रकृति में है। इंडस्ट्री एनालिसिस से पता चलता है कि जिन राज्यों में ऐसी सुविधाएं स्थापित की गईं, वहां मालिकों की हिचकिचाहट और एसेट वैल्यू के कथित नुकसान के कारण वाहनों का स्क्रैपिंग रेट बहुत कम रहा। 'प्री-बाइंग' की थकान की भी समस्या है; एमिशन स्टैंडर्ड में पिछले बदलावों ने दिखाया है कि जब मैन्युफैक्चरर्स छूट देते हैं, तो डिमांड आगे खींच ली जाती है, जिससे बाद में बिक्री में भारी गिरावट आती है। रेगुलेटरी नजरिए से, व्हीकल असेसमेंट और डिस्पोजल के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी का मतलब है कि प्रवर्तन असंगत बना हुआ है। अगर इंसेंटिव पैकेज BS-VI/EV टेक्नोलॉजी की बढ़ती लागत और छोटे फ्लीट ऑपरेटरों की स्थिर कमाई के बीच के अंतर को पाटने में विफल रहता है, तो यह स्कीम सरकार के बैलेंस शीट पर एक 'स्ट्रैंडेड एसेट' बनकर रह सकती है।
फॉरवर्ड आउटलुक
आगे बढ़ते हुए, मार्केट पार्टिसिपेंट्स इन नई स्क्रैपिंग सेंटरों के उपयोग दर पर नजर रखेंगे। अगर इसका उपयोग केवल बड़े फ्लीट ऑपरेटरों तक ही सीमित रहता है, तो दिल्ली की वायु गुणवत्ता पर इसका प्रभाव नगण्य होगा। इस पॉलिसी की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या राज्य सरकारें केवल टैक्स छूट से आगे बढ़कर स्क्रैपिंग इंसेंटिव को व्यापक लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम में सफलतापूर्वक एकीकृत कर सकती हैं, जिससे औसत फ्लीट ऑपरेटर के लिए कुल स्वामित्व लागत प्रभावी ढंग से कम हो सके।
