केंद्रीय मंत्री HD कुमारस्वामी ने बेंगलुरु की NICE रोड पर टोल वसूली तुरंत रोकने की मांग की है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस प्रोजेक्ट को 'सबसे बड़ा घोटाला' करार दिया है। कोर्ट ने ज़मीन अधिग्रहण और मुआवज़े को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिससे प्रोजेक्ट डेवलपर के लिए कानूनी और परिचालन संबंधी अनिश्चितता बढ़ गई है।
केंद्रीय मंत्री HD कुमारस्वामी ने कर्नाटक सरकार को 7 से 10 दिनों की मोहलत दी है। उन्होंने बेंगलुरु की Nandi Infrastructure Corridor Enterprises (NICE) रोड पर टोल वसूली तत्काल रोकने की मांग की है। मंत्री ने जनता से भी टोल का भुगतान बंद करने की अपील की है, क्योंकि उनका मानना है कि यह राज्य का 'सबसे बड़ा घोटाला' है। कुमारस्वामी की यह मांग कर्नाटक हाई कोर्ट के 29 जुलाई, 2026 के एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद आई है, जो Bengaluru-Mysuru Infrastructure Corridor (BMIC) प्रोजेक्ट से संबंधित है।
कोर्ट का कड़ा रुख
कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में BMIC प्रोजेक्ट को राज्य का 'सबसे बड़ा घोटाला' बताया था और सरकार से इस मामले की एक स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट कराने की सिफारिश की थी। कोर्ट की यह राय प्रोजेक्ट के फ्रेमवर्क समझौते के कार्यान्वयन को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवादों से उपजी है। इसमें कथित तौर पर अधिग्रहीत ज़मीन को व्यावसायिक उपयोग के लिए डायवर्ट करना, किसानों को पर्याप्त मुआवज़ा न देना और टोल वसूली में अनियमितताओं जैसे आरोप शामिल हैं। अपने फैसले में, डिवीजन बेंच ने जुलाई 2025 के एक पिछले आदेश को बरकरार रखा, जिसमें ज़मीन अधिग्रहण की कुछ सूचनाओं को रद्द कर दिया गया था। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि अधिकारियों ने दो दशकों से अधिक समय तक भूमि का मूल्यांकन या भूमि मालिकों को मुआवज़ा देने में विफलता दिखाई थी।
व्यावसायिक और कानूनी जोखिम
यह स्थिति प्रोजेक्ट के लिए गंभीर परिचालन और कानूनी जोखिम पैदा करती है। कोर्ट द्वारा फॉरेंसिक ऑडिट की मांग और ज़मीन अधिग्रहण की सूचनाओं को रद्द करने से प्रोजेक्ट की बुनियादी ढांचा संपत्तियों की कानूनी वैधता पर अनिश्चितता छा गई है। केंद्रीय मंत्री की टोल भुगतान रोकने की मांग, यदि जनता द्वारा मानी जाती है, तो कंपनी की मुख्य आय धारा को बाधित कर सकती है।
मार्केट पर असर?
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि Nandi Infrastructure Corridor Enterprises (NICE) एक सूचीबद्ध नहीं, बल्कि एक प्राइवेट कंपनी है। इसलिए, भारतीय शेयर बाजारों पर इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा, और सूचीबद्ध इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के साथ देखी जाने वाली अस्थिरता यहाँ लागू नहीं होती है। हालांकि, यह मामला लंबे समय तक चलने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर कंसेशन समझौतों में नियामक और कानूनी जोखिमों का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है, खासकर जब इसमें ज़मीन अधिग्रहण और कई दशकों की प्रोजेक्ट समय-सीमा शामिल हो।
आगे क्या?
प्रोजेक्ट का भविष्य राज्य सरकार की प्रतिक्रिया और लंबित फॉरेंसिक ऑडिट पर निर्भर करेगा। इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के निवेशक और हितधारक इस बात पर नज़र रखेंगे कि क्या राज्य सरकार सुझाई गई स्वतंत्र जांच शुरू करती है, क्योंकि इससे कॉरिडोर की परिचालन संरचना में और कानूनी चुनौतियाँ या बदलाव आ सकते हैं। मुख्य निगरानी बिंदु टोल प्लाज़ा और प्रोजेक्ट के मूल समझौतों के अनुपालन से संबंधित न्यायिक निर्देशों के संबंध में राज्य सरकार की आधिकारिक कार्य योजना होगी।
