Delhi-NCR में प्राइवेट स्लीपर बसों के ऑडिट में सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ती नजर आई हैं। सर्विलांस और इमरजेंसी प्रोटोकॉल न होने से अब ऑपरेटरों पर कड़े नियमों और भारी कंप्लायंस लागत का खतरा मंडरा रहा है।
सुरक्षा के नाम पर लापरवाही
पारी चौक के पास हाल ही में हुई एक गंभीर घटना के बाद, Delhi-NCR में चल रही लंबी दूरी की प्राइवेट स्लीपर बसों का जमीनी स्तर पर ऑडिट किया गया। इस जांच में सामने आया है कि ज्यादातर प्राइवेट ऑपरेटर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए जरूरी बेसिक सुरक्षा मानकों को भी पूरा नहीं कर रहे हैं।
जांच में पाया गया कि कई बसों में इमरजेंसी SOS बटन या तो थे ही नहीं, या फिर काम नहीं कर रहे थे। सर्विलांस कैमरों की स्थिति भी बेहद खराब मिली। कई बसों में पैनिक बटन ऐसी जगह लगे हैं जहां से यात्री उन तक पहुंच ही नहीं सकते। साथ ही, इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबरों का भी कहीं अता-पता नहीं है।
ऑपरेटरों के लिए बढ़ा खतरा
इन्वेस्टर्स और बाजार के जानकारों के लिए यह एक चेतावनी है। ट्रांसपोर्ट सेक्टर, खास तौर पर प्राइवेट पैसेंजर ऑपरेटरों पर अब रेगुलेटरी गाज गिर सकती है। बढ़ती सुरक्षा चिंताओं के कारण स्टेट ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट्स पर सख्त नियम लागू करने का दबाव बढ़ गया है।
आने वाले समय में ऑपरेटरों को इन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है:
- सख्त परमिट रिन्यूअल: परमिट रिन्यूअल की प्रक्रिया और कठिन हो सकती है।
- अनिवार्य रेट्रोफिटिंग: सर्विलांस उपकरणों को अनिवार्य रूप से लगाने का खर्च बढ़ सकता है।
- अचानक जांच (Surprise Inspections): लोकल अथॉरिटीज द्वारा छापेमारी बढ़ सकती है।
फाइनेंशियल इम्पैक्ट
इन बदलावों से ऑपरेटर्स की Compliance Cost यानी नियमों के पालन में होने वाला खर्च काफी बढ़ जाएगा। कंपनियों को अब नई सेफ्टी हार्डवेयर लगाने, क्रू मेंबर्स के बैकग्राउंड वेरिफिकेशन और स्टाफ ट्रेनिंग पर ज्यादा खर्च करना होगा। यदि कंपनियां समय रहते इन खामियों को दूर नहीं करती हैं, तो उनके ऑपरेशनल परमिट रद्द हो सकते हैं या गाड़ियां जब्त की जा सकती हैं, जिससे उनके रेवेन्यू पर सीधा असर पड़ेगा।
फिलहाल, बाजार की नजर इस बात पर है कि ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी कब तक नए सुरक्षा आदेश या लाइसेंसिंग नियमों में बदलाव का ऐलान करती है।
