मुंबई-गोवा हाईवे के विस्तार प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत में बड़ी बढ़ोतरी हुई है। अब यह प्रोजेक्ट ₹11,409 करोड़ से बढ़कर **₹16,909 करोड़** पर पहुंच गया है, जबकि काम अभी भी पूरा नहीं हुआ है।
बजट से बाहर हुआ खर्च
महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रोजेक्ट पर अब तक ₹11,577 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं, फिर भी सड़क का एक बड़ा हिस्सा अधूरा पड़ा है। विशेष रूप से परशुराम घाट-अरावली खंड (चिपलून-रत्नागिरी सेक्शन) में स्थिति चिंताजनक है, जहाँ लागत ₹983 करोड़ से 126% बढ़कर ₹2,226 करोड़ तक पहुंच गई है।
देरी के पीछे के बड़े कारण
NH-66 के चौड़ीकरण के इस काम में 10 अलग-अलग कंस्ट्रक्शन पैकेज शामिल हैं। प्रोजेक्ट में देरी की मुख्य वजहों में जमीन अधिग्रहण (Land Acquisition), मंजूरी मिलने में देरी और ठेकेदारों के सामने आ रही फाइनेंशियल दिक्कतें शामिल हैं। फंड की कमी के कारण काम की रफ्तार धीमी हो गई है, जिससे महंगाई और ओवरहेड खर्चों के कारण प्रोजेक्ट की लागत लगातार बढ़ती जा रही है।
कोर्ट की नाराजगी और आम जनता का दर्द
यह मामला अब कानूनी गलियारों में भी चर्चा का विषय है। जनवरी 2024 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने देरी पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि इससे जनता को भारी परेशानी हो रही है और सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ रहा है। खास तौर पर गणेश उत्सव के दौरान, जब मुंबई से कोंकण जाने वाले लोगों की भीड़ होती है, तब इन अधूरे रास्तों पर भीषण जाम यात्रियों के लिए मुसीबत का सबब बन जाता है।
आगे क्या होगा?
इन्वेस्टर्स और इंफ्रा सेक्टर पर नजर रखने वालों के लिए सबसे बड़ा सवाल प्रोजेक्ट के पूरा होने की टाइमलाइन है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार एडमिनिस्ट्रेटिव स्तर पर कोई कड़े कदम उठाएगी या ठेकेदारों को बदलने की प्रक्रिया शुरू होगी, ताकि इस डेडलॉक को खत्म किया जा सके।
