Middle East में लगातार बढ़ रहे भू-राजनीतिक तनाव ने ग्लोबल शिपिंग कॉस्ट्स (shipping costs) में भारी इजाफा कर दिया है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, फ्रेट रेट्स (freight rates) में 20% से 30% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इसकी सीधी वजह यह है कि शिपिंग कंपनियों को अब ज्यादा सुरक्षा जोखिमों के चलते अपने जहाजों को लंबे और महंगे रूट्स से निकालना पड़ रहा है। CMA CGM जैसी बड़ी शिपिंग कंपनियों ने तो $4,000 प्रति रीफर कंटेनर तक का इमरजेंसी कॉन्फ्लिक्ट सरचार्ज (Emergency Conflict Surcharge - ECS) लगा दिया है। वहीं, Mediterranean Shipping Company (MSC) ने इस क्षेत्र में बुकिंग्स को अस्थायी रूप से रोक दिया है। केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) जैसे वैकल्पिक रास्तों से गुजरने पर शिपमेंट में 10-14 दिन ज्यादा लग रहे हैं और फ्यूल की खपत 40% तक बढ़ रही है, जिससे लागत और भी बढ़ गई है।
भारत का एक्सपोर्ट सेक्टर, जिसने फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में $820 बिलियन से ज्यादा का आंकड़ा पार किया है, वह इन बाहरी झटकों से जूझ रहा है। 2026 तक ग्लोबल ट्रेड ग्रोथ (global trade growth) के धीमे होने की उम्मीद है, खासकर अमेरिका, चीन और यूरोप जैसे प्रमुख बाजारों में। ऐसे में फ्रेट रेट्स का बढ़ना निर्यातकों के लिए दोहरी मार साबित हो रहा है। खासतौर पर फल और मांस जैसे खराब होने वाले सामान (perishable goods) के निर्यातकों को शिपमेंट रद्द होने और देरी के कारण तुरंत भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह स्थिति अतीत के संकटों की याद दिलाती है, जब सप्लाई चेन में आई बाधाओं ने साउथ एशिया के समुद्री व्यापार को बुरी तरह प्रभावित किया था।
यह संकट भारत की ग्लोबल सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं के प्रति भेद्यता (vulnerability) को भी उजागर करता है। सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए उपायों पर विचार कर रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संघर्ष और वैश्विक व्यापार नीति की अनिश्चितता के चलते तत्काल समाधान खोजना मुश्किल है। अतीत में सरकार ने क्रेडिट गारंटी स्कीम्स (credit guarantee schemes) जैसे कदम उठाए थे, लेकिन वे मौजूदा भू-राजनीतिक हकीकत को नहीं बदल सकते। Middle East के तनाव का असर केवल शिपिंग कॉस्ट पर ही नहीं, बल्कि कच्चे तेल की कीमतों पर भी पड़ सकता है, जिससे महंगाई और रुपये की स्थिरता पर भी खतरा मंडरा सकता है। इसके अलावा, 2025 में अमेरिकी टैरिफ (US tariffs) जैसी व्यापारिक चुनौतियां पहले से ही कम मार्जिन पर काम कर रहे भारतीय निर्यातकों के लिए मुश्किलें बढ़ा रही हैं। लंबी अवधि में एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस (export competitiveness) बनाए रखने के लिए सिर्फ अल्पकालिक सहायता काफी नहीं होगी, बल्कि डायवर्सिफिकेशन (diversification) और स्ट्रक्चरल रेजिलिएंस (structural resilience) की जरूरत है।
