₹992 करोड़ से सीधे ₹516 करोड़ पर आया मामला
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 24 फरवरी, 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में MMOPL को यह राहत दी है। यह मामला अगस्त 2023 के उस आर्बिट्रल अवार्ड से जुड़ा है, जिसमें MMRDA को MMOPL को ₹992 करोड़ और ब्याज का भुगतान करने का आदेश दिया गया था। हाई कोर्ट के इस फैसले ने अवार्ड की रकम को लगभग आधा कर दिया है, जो यह दर्शाता है कि MMRDA की मूल अवार्ड को चुनौती देने वाली दलीलें काफी हद तक सही साबित हुईं।
यह विवाद प्रोजेक्ट की लागत, टिकट की दरों और वर्सोवा-अंधेरी-घाटकोपर मेट्रो लाइन के अनुबंध संबंधी कई मुद्दों पर सालों से चला आ रहा है। ₹516 करोड़ की यह रकम MMOPL के लिए एक वित्तीय इनफ्लो तो है, लेकिन यह आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल की पहली आकलन राशि से काफी कम है। 74% हिस्सेदारी वाली Reliance Infrastructure इस फैसले की समीक्षा कर रही है और आगे की कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जाएगा। यह नतीजा भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) प्रोजेक्ट्स में मौजूद वित्तीय अनिश्चितताओं और लंबी कानूनी लड़ाइयों को उजागर करता है।
Reliance Infra की वित्तीय स्थिति पर असर?
Reliance Infrastructure, जो इस समय अपने 52-वीक लो के करीब कारोबार कर रही है और जिसका मार्केट कैप लगभग ₹4,000 करोड़ के आसपास है, पहले से ही वित्तीय दबाव में है। कंपनी पर ₹3,927 करोड़ की कंटिंजेंट लायबिलिटी (contingent liabilities) भी है। ऐसे में, यह आंशिक अवार्ड कंपनी की वित्तीय स्थिति में कोई बड़ा बदलाव लाने की संभावना कम है। पिछले एक साल में कंपनी का शेयर 64.87% तक गिर चुका है।
यह मामला भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर PPP प्रोजेक्ट्स में आने वाली चुनौतियों का एक बड़ा उदाहरण है। हाल ही में 'Economic Survey 2025-26' ने भी ऐसे प्रोजेक्ट्स को डूबने से बचाने के लिए 'पुनर्निगोशिएशन फ्रेमवर्क' (renegotiation framework) की वकालत की है। MMOPL का यह मामला बताता है कि अनुबंधों की व्याख्या, लागत में वृद्धि और विवाद समाधान में देरी कैसे प्रोजेक्ट्स की वित्तीय सेहत पर भारी पड़ती है, और निवेशकों का भरोसा कम करती है।