ईंधन पर टैक्स कटौती से मिली फौरी राहत
महाराष्ट्र सरकार का यह कदम भारतीय एयरलाइन इंडस्ट्री के लिए बड़ी मददगार साबित हो सकता है। वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव के चलते एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की ग्लोबल कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। मई 2026 के शुरुआती हफ्ते में जहां ये कीमतें $162.89 प्रति बैरल तक पहुंच गईं, वहीं फरवरी अंत में ये $99.40 के आसपास थीं। एयरलाइंस के ऑपरेटिंग खर्चों का 35-40% हिस्सा सीधे फ्यूल पर जाता है, ऐसे में यह टैक्स कटौती महत्वपूर्ण है। इस फैसले के बाद मुंबई एयरपोर्ट पर फ्यूल भराना, दिल्ली एयरपोर्ट (जहां 25% VAT है) की तुलना में सस्ता हो जाएगा। महाराष्ट्र के पुणे और नागपुर एयरपोर्ट पर भी इसका फायदा मिलेगा।
लंबे समय से चली आ रही मांगें अब भी अनसुलझी
हालांकि, यह टैक्स कटौती सिर्फ एक अस्थायी उपाय है और इसकी एक समय-सीमा 14 नवंबर, 2026 तक ही है। एयरलाइंस लंबे समय से एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) को गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) के दायरे में लाने की मांग कर रही हैं। GST में आने से एयरलाइंस को इनपुट टैक्स क्रेडिट (Input Tax Credit) का लाभ मिलता, जिससे उनके कुल खर्चे कम हो सकते थे। इसके अलावा, इंडस्ट्री चाहती है कि फ्यूल पर लगने वाले प्रतिशत-आधारित VAT की जगह एक निश्चित टैक्स राशि तय की जाए। इससे फ्यूल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर कम होगा। उदाहरण के तौर पर, गुजरात जैसे राज्यों में VAT दर करीब 4% है, जो काफी कम है। वर्तमान में हुई कटौती से तत्काल राहत तो है, लेकिन ये बड़े मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। ये सीधे तौर पर इंटरग्लोब एविएशन लिमिटेड (IndiGo), जिसका मार्केट कैप लगभग ₹1.1 ट्रिलियन और P/E रेश्यो 35-45 के बीच है, और स्पाइसजेट लिमिटेड (SpiceJet Ltd), जिसका मार्केट कैप करीब ₹200 बिलियन है और कंपनी अक्सर मुनाफे के लिए संघर्ष करती है, जैसी कंपनियों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
टैक्स कट के बावजूद बने रहेंगे जोखिम
टैक्स में तत्काल राहत मिलने के बावजूद, एयरलाइंस के लिए जोखिम अभी भी बने हुए हैं। महाराष्ट्र सरकार की यह टैक्स कटौती सिर्फ नवंबर 2026 तक ही सीमित है, जो उन्हें कोई लंबी अवधि की सुरक्षा नहीं देती। ऐसे में एयर इंडिया (Air India) जैसी एयरलाइंस, जिन्होंने पहले ही फ्यूल खर्चों के कारण अंतरराष्ट्रीय उड़ानें कम कर दी हैं, उन्हें कीमतों में फिर से वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है। ATF को GST के दायरे में न लाने का मतलब है कि एयरलाइंस इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा करने से चूक जाएंगी, जो कि अन्य उद्योगों में एक आम प्रक्रिया है। विभिन्न राज्यों के बीच VAT दरों में अंतर भी अनुचित प्रतिस्पर्धा पैदा करता है। महाराष्ट्र की कटौती से मुंबई बेशक दिल्ली से अधिक प्रतिस्पर्धी बन गया है, लेकिन कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य उच्च VAT दर बनाए हुए हैं, जो समग्र प्रभाव को सीमित करता है। विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि कमजोर वित्तीय स्थिति और अधिक कर्ज वाली एयरलाइंस, जैसे स्पाइसजेट, फ्यूल की कीमतों और करेंसी में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। वेस्ट एशिया में तनाव का फिर से बढ़ना या सप्लाई चेन की दिक्कतें इस राज्य-स्तरीय कर परिवर्तन से मिले किसी भी लाभ को जल्दी ही खत्म कर सकती हैं।
आगे का रास्ता
महाराष्ट्र सरकार का यह फैसला नागरिक उड्डयन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) की अपील और मुंबई के हवाई यातायात के महत्व को देखते हुए एक अल्पकालिक प्रतिक्रिया प्रतीत होती है। हालांकि, ऐसे लाभों का स्थायी प्रभाव भविष्य की सरकारी नीतियों और समग्र अर्थव्यवस्था पर निर्भर करेगा। एयरलाइन उद्योग का दीर्घकालिक भविष्य ATF को GST के दायरे में लाने और राष्ट्रव्यापी स्तर पर अधिक सुसंगत, संभवतः निश्चित, कर प्रणाली अपनाने से जुड़ा है। इन संरचनात्मक बदलावों के बिना, एयरलाइंस अस्थिर लागतों के साथ एक कठिन बाजार में काम करती रहेंगी, जिसके लिए वित्तीय दबावों को प्रबंधित करने हेतु लगातार समायोजन की आवश्यकता होगी।