Lufthansa Group: फ्यूल की महंगाई से एयरलाइन का बुरा हाल! **20,000** फ्लाइट्स कैंसिल

TRANSPORTATION
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AuthorMehul Desai|Published at:
Lufthansa Group: फ्यूल की महंगाई से एयरलाइन का बुरा हाल! **20,000** फ्लाइट्स कैंसिल
Overview

Lufthansa Group ने फ्यूल की आसमान छूती कीमतों के चलते बड़ा फैसला लिया है। एयरलाइन **20,000** से ज़्यादा शॉर्ट-हॉल फ्लाइट्स को अक्टूबर तक के लिए रद्द कर रही है। इस कदम से एयरलाइन लगभग **40,000** मीट्रिक टन फ्यूल बचाएगी और अपने यूरोपीय नेटवर्क में नुकसान वाले रूट्स को समेटेगी।

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बढ़ती जियोपॉलिटिकल टेंशन और उसके चलते फ्यूल की कीमतों में भारी उछाल ने एयरलाइन कंपनियों की कमर तोड़ दी है। इसी के चलते, Lufthansa Group ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अक्टूबर तक करीब 20,000 शॉर्ट-हॉल फ्लाइट्स को कैंसिल कर दिया है। इस कदम से एयरलाइन को लगभग 40,000 मीट्रिक टन फ्यूल बचाने में मदद मिलेगी और कंपनी की वित्तीय सेहत को स्थिर किया जाएगा।

एयरलाइन इंडस्ट्री पर फ्यूल की कीमतों का दबाव जगजाहिर है। जेट फ्यूल की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं और अब यह एयरलाइन के कुल ऑपरेटिंग खर्च का 25% से 30% तक पहुंच गया है। इस स्थिति से निपटने के लिए Lufthansa Group ने फ्लाइट्स की संख्या कम करने का फैसला लिया है। कंपनी का स्टॉक (LHA.DE) इस साल अब तक करीब 6.54% नीचे कारोबार कर रहा है, जो सेक्टर में एनर्जी की वोलेटाइल कीमतों के प्रति चिंता को दर्शाता है।

इस स्ट्रेटेजी के तहत, Lufthansa Group अपने प्रमुख यूरोपीय हब जैसे फ्रैंकफर्ट, म्यूनिख, ज्यूरिख, वियना, ब्रुसेल्स और रोम से चलने वाली नॉन-प्रॉफिटेबल शॉर्ट-हॉल रूट्स को कंसॉलिडेट (एकत्रित) करेगी। पोलैंड और नॉर्वे जैसे देशों के कुछ रूट्स पर फ्लाइट्स अस्थायी रूप से बंद की जा रही हैं। Lufthansa का यह कदम ग्लोबल एयरलाइन इंडस्ट्री के व्यापक ट्रेंड के अनुरूप है। Air Canada, KLM, Delta Air Lines और United Airlines जैसी बड़ी एयरलाइंस भी बढ़ती लागत के दबाव को कम करने के लिए अपने समर फ्लाइट प्लान में बदलाव कर रही हैं, कैपेसिटी घटा रही हैं और विमानों को ग्राउंड कर रही हैं। खास तौर पर यूरोपीय एयरलाइंस पर यह दबाव ज्यादा है क्योंकि वे इंपोर्टेड जेट फ्यूल पर ज्यादा निर्भर हैं।

इसके अलावा, Lufthansa अपनी फ्लीट (विमानों के बेड़े) में भी बड़े बदलाव कर रही है। एयरलाइन अपने आखिरी चार Airbus A340-600s को परमानेंटली रिटायर कर रही है और दो Boeing 747-400s को ग्राउंड कर रही है। साथ ही, नुकसान झेल रही अपनी रीजनल सब्सिडियरी Lufthansa CityLine को भी बंद करने का फैसला लिया गया है।

इस मुश्किल लागत माहौल में, Lufthansa की वैल्यूएशन (मूल्यांकन) की तुलना इसके प्रतिस्पर्धियों से की जा सकती है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, Lufthansa का P/E रेश्यो लगभग 5.70 है। यह Air France-KLM (जिसका P/E 1.5 से 3.15 के बीच है) और International Airlines Group (IAG) (जो लगभग 6.75 से 6.79 पर है) की तुलना में एक मॉडरेट वैल्यूएशन दर्शाता है। Ryanair का P/E रेश्यो 10.4 से 13.39 के बीच है। Lufthansa की मार्केट कैपिटलाइजेशन €9.34 बिलियन से €11.69 बिलियन के बीच अनुमानित है। लागत दबाव के बावजूद, Lufthansa एक मजबूत फ्यूल हेजिंग स्ट्रेटेजी से लाभान्वित हो रही है, जो J.P. Morgan के एनालिस्ट्स के अनुसार, Ryanair के बाद दूसरे नंबर पर आती है। यह हेजिंग कंपनी को कुछ हद तक राहत देती है।

हालांकि Lufthansa की हेजिंग स्ट्रेटेजी कुछ सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन महत्वपूर्ण जोखिम बने हुए हैं। कंपनी पर भारी कर्ज है, जिसका डेट-टू-इक्विटी रेश्यो 1.03 दर्ज किया गया था, जिससे कुछ एनालिस्ट्स शेयरहोल्डर वैल्यू को लेकर चिंतित हैं। इसके अलावा, जियोपॉलिटिकल अस्थिरता और तेल की कीमतों पर इसका असर अनिश्चित बना हुआ है। कंपनी पायलट स्ट्राइक जैसी परिचालन संबंधी दिक्कतों से भी जूझ रही है। एनालिस्ट्स का Lufthansa को लेकर नजरिया अभी सतर्क है, जिसमें औसत टारगेट प्राइस मौजूदा ट्रेडिंग स्तरों से थोड़ा ही ऊपर है। J.P. Morgan Chase के एनालिस्ट Jamie Baker के अनुसार, कई एयरलाइंस के लिए लाभप्रदता की उम्मीदें अब धूमिल हो गई हैं, और बढ़ी हुई परिचालन लागत के कारण मार्जिन में कमी आना एक बड़ा चलन बन गया है।

भविष्य को देखते हुए, कुछ एनालिस्ट्स Lufthansa के स्टॉक प्राइस का अनुमान मौजूदा तिमाही के अंत तक लगभग €7.86 और एक साल में €7.26 के आसपास लगा रहे हैं। एयरलाइन इंडस्ट्री की लाभप्रदता अब केवल रेवेन्यू ग्रोथ के बजाय लागत नियंत्रण और ऑपरेटिंग लीवरेज पर ज्यादा निर्भर कर रही है, क्योंकि बढ़ी हुई मांग के साथ-साथ परिचालन लागत भी बढ़ रही है। इन चुनौतियों के बावजूद, Delta और United जैसी एयरलाइंस के मैनेजमेंट अपने लॉन्ग-टर्म स्ट्रेटेजी और लचीलेपन पर विश्वास जता रहे हैं। हालांकि, फ्यूल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और जारी जियोपॉलिटिकल तनाव यह संकेत देते हैं कि एयरलाइन सेक्टर आने वाले समय तक एक जटिल और चुनौतीपूर्ण ऑपरेटिंग माहौल में बना रहेगा।

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