परिचालन में मिली राहत, पर खतरा बरकरार
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच, जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) ने तेजी से कदम उठाए हैं। एक मल्टी-डिपार्टमेंटल टास्क फोर्स के गठन और मंत्रालय द्वारा जारी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के ज़रिए, पोर्ट ने 1 मार्च को फंसे हुए लगभग 5,000 टीईयू (TEU) कंटेनरों के बैकलॉग को 8 मार्च तक घटाकर करीब 3,200 टीईयू कर लिया है। इसमें खराब होने वाले कंटेनरों की संख्या भी 2,000 से घटकर लगभग 1,000 रह गई है। पोर्ट, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, JNPA ने एक नोडल अधिकारी भी नियुक्त किया है ताकि व्यापार संबंधी रुकावटों का समाधान 24-72 घंटों के भीतर किया जा सके। यह कदम जहाजों के शेड्यूल को बेहतर बनाने और कार्गो की आवाजाही को सुगम बनाने में मदद कर रहा है।
बड़े पैमाने पर निर्यात को खतरा
हालांकि JNPA ने अपने स्तर पर परिचालन चुनौतियों को नियंत्रित किया है, लेकिन भारत की व्यापक निर्यात अर्थव्यवस्था मध्य पूर्व की अस्थिरता के प्रति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। व्यवधानों के कारण खरीदारों से ऑर्डर रद्द होने की खबरें आ रही हैं। शिपिंग लागत में भारी उछाल आया है, प्रति शिपमेंट $1,500 से $4,000 तक का अतिरिक्त सरचार्ज लग रहा है, जिससे कुल लॉजिस्टिक्स खर्च बढ़ गया है। अनुमान है कि इस संकट से भारत के माल निर्यात को 8 से 10 बिलियन डॉलर तक का झटका लग सकता है। पश्चिम एशिया को होने वाले कृषि शिपमेंट, जिनकी कीमत 2025 में लगभग 11.8 बिलियन डॉलर थी, विशेष रूप से खतरे में हैं। अकेले चावल निर्यात, जो खाड़ी बाजारों के लिए एक प्रमुख कमोडिटी है और 4.43 बिलियन डॉलर का है, उसमें लगभग 4 लाख मीट्रिक टन माल पोर्ट पर फंसा हुआ है या ट्रांजिट में है। इससे पहले लाल सागर संकट के कारण अगस्त 2024 में भारत के निर्यात में 9.3% की गिरावट आई थी और व्यापार घाटा बढ़ा था। कुल मिलाकर, ऐसे भू-राजनीतिक झटकों से भारत को 30 बिलियन डॉलर से अधिक का निर्यात नुकसान हो सकता है।
महत्वपूर्ण जोखिम और भविष्य की राह
यह मौजूदा संकट भारत के व्यापार इकोसिस्टम की कुछ संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करता है। यूरोप को होने वाले भारत के लगभग 80% निर्यात लाल सागर मार्ग से गुजरते हैं, और कच्चे तेल का 40% से अधिक आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। यदि संघर्ष बढ़ता है, तो तेल की कीमतों में $90-100 प्रति बैरल से ऊपर की लगातार बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ेगा, महंगाई बढ़ेगी और रुपये पर दबाव आएगा। समुद्री बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई लागत पहले ही बढ़ रही है, जो निर्माताओं और निर्यातकों के मार्जिन को कम कर रही है। पिछली घटनाओं के कारण शिपिंग में 2-3 हफ्तों की देरी हुई थी, जिससे सप्लाई चेन बाधित हुई और आयात लागत बढ़ी। इसलिए, भारत के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपने बंदरगाह के बुनियादी ढांचे और परिचालन दक्षता को बढ़ाए, साथ ही निर्यात बाजारों में विविधता लाए और वैकल्पिक सप्लाई चेन रूट सुरक्षित करे। भारतीय बंदरगाह क्षेत्र में विकास की उम्मीद है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक स्थिरता भू-राजनीतिक जोखिमों से निपटने और अस्थिर चोकपॉइंट्स पर निर्भरता कम करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।