सरकार पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न व्यापार बाधाओं को दूर करने के लिए लॉजिस्टिक्स को सुगम बनाने की दिशा में तेजी से कदम उठा रही है। इस दिशा में, कैबोटेज (Cabotage) नियमों में अस्थायी ढील देने और EXIM कंटेनर की 180-दिन की री-एक्सपोर्ट समय सीमा को आसान बनाने जैसे प्रस्तावों पर विचार किया जा रहा है। इन उपायों का मकसद तात्कालिक रूप से शिपिंग क्षमता को बढ़ाना और कंटेनर की कमी को दूर करना है।
यह कदम पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन में जारी गड़बड़ी का सीधा नतीजा है, जिसने भारत के समुद्री लॉजिस्टिक्स (Maritime Logistics) को एक नाजुक मोड़ पर ला खड़ा किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे अहम समुद्री रास्तों पर आई रुकावटों ने भारत के व्यापार पर गहरा असर डाला है, जहां भारत का लगभग 31% एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट (Export-Import) कार्गो गुजरता है। यूरोप, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका तक जाने वाले इन रास्तों से भारत का सालाना करीब 244 अरब डॉलर का मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट (Merchandise Exports) जुड़ा है। इस संकट का सीधा नतीजा है कि शिपिंग की लागत आसमान छू रही है। भारत के पश्चिमी तट से मध्य पूर्व तक कंटेनर शिपिंग की दरें 909% तक उछल गई हैं, जबकि वॉर-रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम (War-risk insurance premiums) में 40-50% की बढ़ोतरी हुई है। आलम यह है कि भारत में करीब 38,000 बीस-फुट समतुल्य यूनिट (TEUs) कार्गो फंसे हुए हैं। इनमें बासमती चावल की करीब 3,000 खेपें और केले व अंगूर जैसे जल्दी खराब होने वाले उत्पादों के करीब 1,000 कंटेनर शामिल हैं। इतना ही नहीं, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी खतरा मंडराने लगा है, क्योंकि हमारे कच्चे तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का आधे से ज्यादा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है।
हालांकि ये उपाय फिलहाल राहत देने के उद्देश्य से उठाए जा रहे हैं, लेकिन ये भारत के लॉजिस्टिक्स ढांचे की गहरी और संरचनात्मक समस्याओं को भी उजागर करते हैं। कैबोटेज नियमों को उदार बनाने की चर्चाएं, जो ऐतिहासिक रूप से भारतीय शिपिंग उद्योग की सुरक्षा के लिए थीं, अब देश की बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत (जो जीडीपी का 13-14% है, जबकि वैश्विक औसत 8-9% है) और ढांचागत कमी को दर्शाती हैं। देश में पोर्ट पर भीड़भाड़ और घरेलू कंटेनर निर्माण क्षमता में एक बड़ा अंतर है – सालाना मांग 350,000 कंटेनरों की है, जबकि उत्पादन केवल 10,000-30,000 कंटेनरों का हो पाता है। ये गंभीर समस्याएं मौजूदा संकट से पहले भी मौजूद थीं, जैसे कि कृषि निर्यात पहले से ही लॉजिस्टिक्स की बाधाओं, कोल्ड चेन की कमी और कटाई के बाद होने वाले नुकसान से जूझ रहा था।
कैबोटेज नियमों में ढील देने के इन प्रस्तावों से भारत के घरेलू समुद्री क्षेत्र के लिए खतरे भी पैदा हो सकते हैं। कम लागत वाले विदेशी जहाजों से प्रतिस्पर्धा बढ़ने पर, भारतीय जहाज मालिकों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है, जो पहले से ही ईंधन और बीमा प्रीमियम में बढ़ोतरी से जूझ रहे हैं। 180-दिन की कंटेनर री-एक्सपोर्ट नियम में ढील से तात्कालिक उपलब्धता तो बढ़ सकती है, लेकिन यह पोर्ट दक्षता और माल के टर्नअराउंड समय जैसी अंतर्निहित समस्याओं को ढक सकती है, जिससे बुनियादी ढांचे के अपग्रेड के बिना भीड़भाड़ बढ़ सकती है। कृषि क्षेत्र विशेष रूप से कमजोर बना हुआ है; कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स में मौजूदा चुनौतियां और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानदंडों को पूरा करने की आवश्यकता, शिपिंग में देरी और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से और बढ़ सकती है। इसके अलावा, आयातित कंटेनरों पर भारी निर्भरता भारत को वैश्विक उपकरणों के असंतुलन के प्रति संवेदनशील बनाती है।
ये तत्काल नीतिगत समायोजन एक गंभीर भू-राजनीतिक संकट के प्रति व्यावहारिक प्रतिक्रियाएं हैं। हालांकि, उनकी दीर्घकालिक प्रभावशीलता भारत के बुनियादी लॉजिस्टिक्स ढांचे और नियामक लचीलेपन को संबोधित करने पर निर्भर करेगी। विश्लेषकों का कहना है कि भू-राजनीतिक जोखिम शिपिंग उद्योग को प्रभावित करते रहेंगे, जिसके लिए लचीलेपन (Resilience) पर लगातार ध्यान देने की आवश्यकता होगी। भारत के व्यापार लक्ष्यों, जैसे कि 2030 तक 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा, लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में बड़े निवेशों पर टिकी है, जिसमें बंदरगाहों, राजमार्गों और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (Dedicated Freight Corridors) का विकास शामिल है। तत्काल संकट प्रबंधन और इन दीर्घकालिक उद्देश्यों – आत्मनिर्भर घरेलू समुद्री उद्योग को बढ़ावा देने और अस्थिर वैश्विक बाजार में लागत-प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने – के बीच संतुलन बनाना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। भारत की व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं की सफलता अंततः इसकी संरचनात्मक सुधार करने की क्षमता पर निर्भर करेगी, न कि केवल प्रतिक्रियावादी नीतिगत बदलावों पर।