बढ़ती लागत और घटता मुनाफा
यह नुकसान मुख्य रूप से कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और गिरते रुपये के कारण हो रहा है। पिछले कुछ समय में ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है, जो कि 15% की बढ़ोतरी है। वहीं, भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले 3% कमजोर होकर ₹83 के स्तर पर आ गया है। इन वजहों से तेल कंपनियों के लिए कच्चे तेल की खरीद महंगी हो गई है, जबकि वे ग्राहकों को पुरानी कीमतों पर ही तेल बेच रही हैं।
मामूली राहत, बड़ा दर्द
अनुमान है कि पेट्रोल और डीजल के दाम में ₹15-20 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की जानी चाहिए, तभी कंपनियां अपना नुकसान पूरा कर पाएंगी। हालांकि, सरकार ₹5 प्रति लीटर की मामूली बढ़ोतरी पर विचार कर रही है, जो कि इस भारी नुकसान के मुकाबले काफी कम है। इस स्थिति में पिछले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में कमाए गए मुनाफे (Profit) को इसी तिमाही में गंवाने का खतरा है।
निजी कंपनियों से मुकाबला और सप्लाई की दिक्कत
हालांकि सरकार का कहना है कि कहीं भी ईंधन की कमी नहीं है, लेकिन ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि कई पंपों पर गाड़ियों को 50-100 लीटर से ज्यादा ईंधन नहीं दिया जा रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि निजी तेल कंपनियां जैसे Nayara Energy और Shell Plc अपनी कीमतों को बाजार के हिसाब से बढ़ा रही हैं। इससे बल्क खरीदार (Bulk Buyers) सरकारी कंपनियों के आउटलेट्स की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे Indian Oil Corp. (IOC), Bharat Petroleum Corp. (BPCL) और Hindustan Petroleum Corp. (HPCL) पर नुकसान का बोझ और बढ़ रहा है। अप्रैल में इन कंपनियों के डीजल बिक्री में 4.8% की बढ़ोतरी देखी गई, जबकि कुल खपत स्थिर रही।
कंपनियों का वैल्यूएशन और भविष्य
ये कंपनियां शेयर बाजार में लिस्टेड हैं। IOC का मार्केट कैप (Market Capitalization) करीब ₹2.5 लाख करोड़ है, BPCL का ₹1.2 लाख करोड़ और HPCL का ₹0.8 लाख करोड़ है। मौजूदा हालात इन कंपनियों के वैल्यूएशन (Valuation) पर भारी पड़ सकते हैं। सरकारी तेल कंपनियों की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वे सरकार की मूल्य निर्धारण नीतियों (Pricing Policies) पर निर्भर रहती हैं। निजी कंपनियों के विपरीत, जो तुरंत कीमतें बदल सकती हैं, सरकारी कंपनियों को ऐसे फैसलों का इंतजार करना पड़ता है, जिससे उन्हें नुकसान होता है।
रिलायंस जैसी कंपनियों की अलग राह
अगर कच्चे तेल की कीमतें यूं ही ऊंची बनी रहीं या बढ़ीं, तो रोज का नुकसान और बढ़ सकता है। यह स्थिति लंबे समय तक चलने वाली नहीं है और इससे सरकारी खजाने पर भी दबाव पड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत के तेल और गैस क्षेत्र में लंबी अवधि में मांग मजबूत रहने की उम्मीद है। लेकिन, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सरकार द्वारा तय की जाने वाली कीमतें सरकारी कंपनियों के लिए बड़ी चिंताएं हैं। Reliance Industries जैसी कंपनियां, जो इंटीग्रेटेड मॉडल (Integrated Model) पर काम करती हैं, उनका मार्केट कैप लगभग ₹20 लाख करोड़ है, और वे अलग वित्तीय स्थिति में हैं।
