भारत की सड़कों का बुरा हाल: नए निर्माण पर करोड़ों खर्च, रखरखाव में लापरवाही, हज़ारों मौतें!

TRANSPORTATION
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत की सड़कों का बुरा हाल: नए निर्माण पर करोड़ों खर्च, रखरखाव में लापरवाही, हज़ारों मौतें!
Overview

भारत में सड़कों की अनदेखी एक जानलेवा संकट बनती जा रही है। साल **2020** से **2024** के बीच सड़क हादसों में **53%** से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें **9,438** से ज़्यादा ज़िंदगियां खत्म हो गईं।

इंफ्रा पर खर्च, सड़कों पर लापरवाही: एक खतरनाक खेल

यह चौंकाने वाली मौतों का आंकड़ा देश की इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पॉलिसी में एक बड़ी खामी को उजागर करता है। सरकार नई सड़कों और हाईवेज़ के निर्माण पर तो भारी भरकम खर्च कर रही है, लेकिन मौजूदा सड़कों के रखरखाव को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। इसका सीधा असर देश की इकोनॉमी पर पड़ रहा है, जो नए प्रोजेक्ट्स में होने वाले निवेश से कहीं ज़्यादा है।

जानलेवा सड़कों का आर्थिक बोझ

देश की सड़कें हर साल जान ले रही हैं। साल 2020 में जहां सड़क हादसों में 1,555 लोगों की मौत हुई थी, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 2,385 हो गई। इन 5 सालों में कुल 9,438 लोगों की जान गई और 19,956 लोग घायल हुए। यह गंभीर स्थिति खराब ड्रेनेज, घटिया निर्माण और समय पर न होने वाले रखरखाव की ओर इशारा करती है। इन हादसों का आर्थिक नुकसान भी बहुत बड़ा है। अनुमान है कि सड़क दुर्घटनाएं और ट्रैफिक जाम हर साल देश की GDP का 3% से 5% तक निगल जाते हैं। वहीं, खराब सड़कों के कारण होने वाले ट्रैफिक जाम से प्रोडक्टिविटी में हर साल 1.5% से 2.0% GDP का नुकसान होता है। भारत में लॉजिस्टिक्स की लागत पहले ही विकसित देशों ( 8-10% GDP) के मुकाबले ज़्यादा ( 13-14% GDP) है, और इन सड़कों की समस्याओं से यह और बढ़ जाती है।

बजट में प्राथमिकता का बड़ा अंतर

सरकारी बजट के आंकड़े भी यही बताते हैं कि नए निर्माण पर कितना ज़्यादा ज़ोर है। 2025-26 के लिए हाईवे डेवलपमेंट पर ₹2.7 लाख करोड़ से ज़्यादा का आवंटन किया गया है, जबकि सड़क सुरक्षा और रखरखाव के लिए केवल चंद करोड़ों का ही प्रावधान है। यह ट्रेंड लगातार बना हुआ है; FY25 में हाईवे के लिए ₹2.72 ट्रिलियन का बजट था, जबकि रखरखाव का बजट कुल कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) का महज़ 1% के आसपास रहा। 'भारतमाला परियोजना' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं तो शुरू हो रही हैं, पर मौजूदा सड़कों की अहमियत को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।

इंफ्रा की अनदेखी के गंभीर खतरे

यह असंतुलन एक बड़ा सिस्टमैटिक रिस्क (Systematic Risk) पैदा कर रहा है। सड़कों की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है, जिससे उनकी मरम्मत का खर्च बढ़ता है और इंफ्रास्ट्रक्चर समय से पहले खराब होने लगता है। नेशनल हाईवेज़ पर ज़्यादा स्पीड और खराब सड़कों के कारण होने वाली दुर्घटनाएं न सिर्फ जान लेती हैं, बल्कि भारत की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ी करती हैं। इससे विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment - FDI) पर भी असर पड़ सकता है। खराब सड़कें बिज़नेस के लिए भी महंगी साबित होती हैं और देश की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) को कमज़ोर करती हैं।

समाधान: रखरखाव को दें प्राथमिकता

इस स्थिति को सुधारने के लिए पब्लिक खर्च (Public Expenditure) की प्राथमिकताओं को बदलना बहुत ज़रूरी है। सड़क रखरखाव और एसेट मैनेजमेंट (Asset Management) पर ज़्यादा ध्यान देना होगा। हमें जर्मनी जैसे देशों से सीखना चाहिए, जहां सड़कों का नियमित निरीक्षण और उनकी जवाबदेही तय होती है। कॉन्ट्रैक्ट्स (Contracts) में मल्टी-ईयर परफॉरमेंस गारंटी (Performance Guarantee) शामिल की जानी चाहिए, ताकि ठेकेदार घटिया काम न कर सकें। रोड एसेट मैनेजमेंट सिस्टम (RAMS) में निवेश बढ़ाने से रखरखाव के लिए फंड और रिसोर्सेज का बेहतर इस्तेमाल होगा। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) भी इसमें भूमिका निभा सकती है, बशर्ते उसमें परफॉरमेंस पर कड़ी नज़र रखी जाए। निवेश को रखरखाव की ओर मोड़कर ही भारत अपनी सड़कों को सुरक्षित बना सकता है और इकोनॉमिक ग्रोथ को मज़बूती दे सकता है।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.