भारत का रोड कंस्ट्रक्शन सेक्टर इस वक्त मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) से मिलने वाले नए प्रोजेक्ट्स की संख्या में भारी गिरावट आई है, जिससे इस सेक्टर की रफ्तार धीमी हो गई है। सरकारी खर्च में कमी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते Larsen & Toubro, IRB Infrastructure, और PNC Infratech जैसी कंस्ट्रक्शन कंपनियों के मुनाफे और रेवेन्यू ग्रोथ पर दबाव देखा जा रहा है।
आखिर क्यों आई मंदी?
इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रोथ का एक अहम हिस्सा रहे रोड कंस्ट्रक्शन सेक्टर में इन दिनों सुस्ती छाई हुई है। सरकार के कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) में कमी और NHAI द्वारा प्रोजेक्ट्स अलॉट करने में आई बड़ी गिरावट, दोनों ही वजहों से इंडस्ट्री की स्पीड कम हो गई है। इस मंदी का असर न सिर्फ सड़कों के निर्माण की गति पर पड़ रहा है, बल्कि Larsen & Toubro, IRB Infrastructure, PNC Infratech और KNR Construction जैसी बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों के फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर भी दिख रहा है।
NHAI के प्रोजेक्ट्स का डेटा
सेक्टर में आ रही नरमी का सबसे बड़ा संकेत NHAI द्वारा दिए जाने वाले नए प्रोजेक्ट्स की संख्या में कमी है। फाइनेंशियल ईयर 27 (FY27) में NHAI ने सिर्फ ₹4,230 करोड़ के प्रोजेक्ट्स अलॉट किए, जबकि FY26 में यह आंकड़ा ₹4,700 करोड़ था। ये आंकड़े FY22 और FY23 के मुकाबले काफी कम हैं, जब प्रोजेक्ट अलॉटमेंट ₹10,000 करोड़ से ज़्यादा था। इन आंकड़ों से लगता है कि NHAI अपने अलॉटमेंट टारगेट्स को पूरा करने में संघर्ष कर रहा है। प्रोजेक्ट्स के अप्रूवल में देरी, ज़मीन अधिग्रहण की दिक्कतें और बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) हाईवे प्रोजेक्ट्स में प्राइवेट प्लेयर्स की घटती दिलचस्पी, ये कुछ ऐसी वजहें हैं जो इस गिरावट का कारण बन रही हैं।
कंस्ट्रक्शन की धीमी रफ्तार और रेवेन्यू पर असर
नए प्रोजेक्ट्स मिलने में कमी के अलावा, असल में सड़क निर्माण की गति भी धीमी पड़ी है। FY27 में अब तक सिर्फ 364 किमी सड़कों का निर्माण हुआ है, जो पिछले साल की तुलना में 35% कम है। कंस्ट्रक्शन कंपनियों के लिए यह धीमी रफ्तार चिंता का विषय है। बड़ी ऑर्डर बुक होने के बावजूद, कंपनियां इन ऑर्डर्स को रेवेन्यू (बिलिंग) में बदलने के लिए संघर्ष कर रही हैं। जब कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी धीमी होती है, तो कंपनियां अपने रेवेन्यू टारगेट्स को पूरा नहीं कर पातीं, जिसका सीधा असर उनके तिमाही नतीजों पर पड़ता है।
मार्जिन पर दबाव और बढ़ती प्रतिस्पर्धा
कई कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव है। सेक्टर में ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है, जहां कंपनियां उपलब्ध चंद प्रोजेक्ट्स को हासिल करने के लिए आक्रामक बोली लगा रही हैं। कई बार तो कंपनियां NHAI के अनुमान से काफी कम कीमत पर बोली लगाकर कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर रही हैं। भले ही इससे उन्हें प्रोजेक्ट मिल जाए, लेकिन मुनाफे के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है। उदाहरण के लिए, IRB Infrastructure ने हाल ही में रेवेन्यू ग्रोथ दर्ज की, लेकिन यह ग्रोथ उनके मुख्य कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स से ज़्यादा टोल कलेक्शन से आई, जो यह दर्शाता है कि कंपनियां नए निर्माण के बजाय मौजूदा एसेट्स पर निर्भर हो रही हैं। ग्लोबल जियो-पॉलिटिकल टेंशन के चलते कमोडिटी की बढ़ती कीमतों ने इन पतले मार्जिन को और भी निचोड़ दिया है।
'भारतमाला' की लागत का सच
2017 में लॉन्च हुआ महत्वाकांक्षी 'भारतमाला' हाईवे प्रोग्राम भी कई बड़ी मुश्किलों का सामना कर रहा है। अनुमानित ₹5.3 लाख करोड़ की लागत बढ़कर ₹10.6 लाख करोड़ हो गई है। ज़मीन की आसमान छूती कीमतें और एक्सप्रेसवे के डिज़ाइन में बदलाव के कारण लागत में हुई इस भारी वृद्धि ने प्रोजेक्ट को फिलहाल रोक दिया है, जिससे पूरे कंस्ट्रक्शन वैल्यू चेन में अनिश्चितता का माहौल है।
निवेशकों को इन बातों पर रखना चाहिए नज़र
इस सेक्टर में निवेश करने वाले निवेशकों को तीन मुख्य बातों पर ध्यान देना चाहिए। पहला, ऑर्डर बुक को पूरा करने की गति पर नज़र रखें, क्योंकि धीमी गति रेवेन्यू को प्रभावित करती रहेगी। दूसरा, प्रॉफिट मार्जिन पर कड़ी नज़र रखें; आक्रामक बोली भविष्य की तिमाहियों में कम मुनाफे का कारण बन सकती है। और तीसरा, कंपनियों के डेट लेवल (Debt Levels) पर नज़र रखें। ऐसे सेक्टर में जहाँ प्रोजेक्ट टाइमलाइन अनिश्चित है और निर्माण धीमा है, ज़्यादा कर्ज वाली कंपनियों को ज़्यादा ब्याज लागत का सामना करना पड़ सकता है, जो उनके बॉटम लाइन को और प्रभावित कर सकता है।
