हाइड्रोजन ट्रेन पायलट की शुरुआत
जींद-सोनीपत हाइड्रोजन ट्रेन पायलट को हरी झंडी मिलना यह दर्शाता है कि भारतीय रेलवे पूरी तरह से विद्युतीकरण (Electrification) के अलावा वैकल्पिक ईंधनों (Alternative Fuels) की भी तलाश कर रहा है। यह 10-कोच वाली ट्रेन, जो एक संशोधित डीज़ल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (DEMU) है, 1,200 kW के फ्यूल सेल सिस्टम का उपयोग करती है। यह तकनीक पावर इक्विपमेंट को कोचों में वितरित करती है, जिसका उद्देश्य वास्तविक दुनिया में हाइड्रोजन ट्रैक्शन (Hydrogen Traction) का परीक्षण करना है।
इनोवेशन बनाम लागत
एक तकनीकी उपलब्धि होने के बावजूद, प्रोजेक्ट की वित्तीय व्यवहार्यता (Financial Viability) पर सवाल उठ रहे हैं। अनुमान है कि प्रत्येक हाइड्रोजन ट्रेनसेट की लागत लगभग ₹80 करोड़ आएगी, और साथ ही रिफ्यूलिंग स्टेशनों जैसे ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए प्रति रूट अतिरिक्त ₹70 करोड़ की आवश्यकता होगी। भारत का ब्रॉड-गेज नेटवर्क पहले से ही 93% विद्युतीकृत है, ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेनों के असली फायदे पर बहस जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाइड्रोजन गैर-विद्युतीकृत हेरिटेज या पहाड़ी मार्गों के लिए उपयुक्त हो सकती है, लेकिन ग्रीन हाइड्रोजन की वर्तमान लागत (₹300-₹400 प्रति किलोग्राम) डीज़ल या बिजली की तुलना में बहुत अधिक है। 2030 तक लागत में काफी कमी आनी चाहिए और नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) को बड़े पैमाने पर लागू करना होगा ताकि हाइड्रोजन प्रतिस्पर्धा कर सके।
प्रणालीगत जोखिम और वित्तीय चिंताएं
यह पायलट प्रोजेक्ट प्रमुख बाधाओं का सामना कर रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर एक बड़ी अड़चन है, क्योंकि रिफ्यूलिंग स्टेशन केवल जींद तक सीमित हैं, जिससे इसका व्यापक उपयोग संभव नहीं हो पा रहा है। हाई-प्रेशर क्रायोजेनिक स्टोरेज (High-Pressure Cryogenic Storage) का उपयोग वजन भी बढ़ाता है और यात्री क्षमता और रखरखाव को प्रभावित कर सकता है। भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) हॉराइजन फ्यूल सेल टेक्नोलॉजीज (Horizon Fuel Cell Technologies) के साथ साझेदारी के माध्यम से इस क्षेत्र में निवेश कर रहा है। हालांकि, BHEL के हालिया घाटे ने महंगी, अप्रमाणित रेल तकनीक में दीर्घकालिक अनुसंधान को फंड करने की उसकी क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आलोचकों का यह भी कहना है कि जब तक सुरक्षा और रखरखाव साबित नहीं हो जाते, तब तक इन ट्रेनों को ट्रांसफर के लिए बैकअप डीज़ल लोकोमोटिव की आवश्यकता हो सकती है, जिससे परिचालन जटिलता बढ़ जाएगी।
नेट-ज़ीरो की ओर रास्ता
जींद-सोनीपत पायलट भारत के 2030 नेट-ज़ीरो लक्ष्यों के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षण है। 'हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज' (Hydrogen for Heritage) पहल की सफलता के लिए, रिफ्यूलिंग नेटवर्क बनाने के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (Public-Private Partnerships) महत्वपूर्ण होंगी, और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की लागत में काफी कमी आनी चाहिए। जबकि तकनीक परीक्षण के लिए तैयार है, इसे एक व्यावहारिक और किफायती परिवहन समाधान बनाने के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक चुनौतियों पर काबू पाना होगा, जो वर्तमान में रेलवे विद्युतीकरण को प्राथमिकता दे रहे हैं।
