भारत की आर्थिक ग्रोथ का 'सिक्रेट'
देश की अर्थव्यवस्था में गजब की मजबूती दिख रही है, जो फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए 6.9% से 7.7% तक की ग्रोथ दिखा सकती है। यह दर ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट्स (emerging markets) की अनुमानित 3-4% ग्रोथ और डेवलप्ड इकोनॉमीज़ (developed economies) के धीमेपन से कहीं ज़्यादा है। यह मज़बूती सिर्फ़ साइक्लिकल नहीं, बल्कि मैक्रोइकॉनॉमिक स्टेबिलिटी और सोची-समझी स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स का नतीजा है।
खास तौर पर, फिस्कल मैनेजमेंट (fiscal management) बेहद अनुशासित रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए फिस्कल डेफिसिट (fiscal deficit) का अनुमान 4.3% है, जो FY26 के टारगेट 4.4% के बाद कंसॉलिडेशन (consolidation) का रास्ता दिखाता है। डेट-टू-जीडीपी रेश्यो (debt-to-GDP ratio) भी नीचे आ रहा है, जो FY27 तक करीब 55.6% रहने का अनुमान है। इन्फ्लेशन (inflation) भी कंट्रोल में है, FY26 के लिए 2.1% और FY27 के लिए करीब 4% रहने की उम्मीद है, जो RBI के टारगेट बैंड में है।
2016 में आया इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) एक गेम-चेंजर साबित हुआ है। इसने क्रेडिट कल्चर (credit culture) को सुधारा है और सितंबर 2024 तक ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (gross non-performing assets) को 12 साल के निचले स्तर 2.6% पर ला दिया है। हालांकि, रेज़ोल्यूशन टाइमलाइन्स (resolution timelines) में देरी और रिकवरी रेट्स (recovery rates) में हालिया कमी जैसी कुछ चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।
पूर्वी भारत को आगे बढ़ाने की राह
पूरी ग्रोथ के बावजूद, भारत के पश्चिमी और पूर्वी राज्यों के बीच एक बड़ी आर्थिक खाई बनी हुई है। पूर्वी राज्य, जिनमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है, आर्थिक विकास में काफी पीछे हैं। इसे पाटने के लिए, पश्चिम बंगाल को एक समुद्री राज्य के रूप में विकसित करने पर खास ज़ोर दिया जा रहा है।
इसके तहत पोर्ट और वॉटरवे डेवलपमेंट (port and waterway development) में बड़े निवेश हो रहे हैं। जनवरी 2026 में ₹830 करोड़ के समुद्री प्रोजेक्ट्स लॉन्च किए गए हैं। ताज़पुर डीप-सी पोर्ट (Tajpur deep-sea port) का विकास इस दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसका मकसद कनेक्टिविटी (connectivity) और पोर्ट-लेड इंडस्ट्रियलाइजेशन (port-led industrialization) के ज़रिए इस क्षेत्र की आर्थिक क्षमता को खोलना है।
आगे की राह में चुनौतियाँ
हालांकि भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ मज़बूत दिख रही है, लेकिन कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। 2026 के लिए ग्लोबल ग्रोथ के अनुमान स्थिर तो हैं, पर वे जियोपॉलिटिकल टेंशन (geopolitical tensions), अस्थिर ट्रेड पॉलिसीज़ (trade policies) और AI-ड्रिवन ग्रोथ (AI-driven growth) की उम्मीदों के बीच नाजुक स्थिति में हैं। इससे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स (export-oriented sectors) पर असर पड़ सकता है।
IBC जैसे रिफॉर्म्स के असर को रेज़ोल्यूशन प्रोसेस (resolution process) में लगातार देरी और रिकवरी रेट्स में गिरावट से कुछ हद तक कम किया जा सकता है। पश्चिम बंगाल में पोर्ट डेवलपमेंट के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में भी एग्जीक्यूशन रिस्क (execution risks) हैं, जैसा कि पिछले टेंडर में हुई दिक्कतों से पता चला। पूर्वी-पश्चिमी आर्थिक असमानता एक जटिल संरचनात्मक समस्या है जिसके लिए लगातार और प्रभावी पॉलिसी इंटरवेंशन (policy intervention) की ज़रूरत होगी। डेट-टू-जीडीपी रेश्यो को कंट्रोल में रखने के लिए फिस्कल प्रूडेंस (fiscal prudence) बनाए रखना ज़रूरी है ताकि इन्वेस्टर कॉन्फिडेंस (investor confidence) बना रहे।
भविष्य का नज़रिया
विश्लेषकों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत बनी रहेगी। IMF, गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) और यूरोमॉनिटर (Euromonitor) जैसी संस्थाएं फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.9% से 7.3% के बीच रहने का अनुमान लगा रही हैं, जो ग्लोबल एवरेज से काफी बेहतर है। जीडीपी कैलकुलेशन्स (GDP calculations) के लिए नए बेस ईयर (base year) को अपनाने से इकोनॉमी की संरचना का ज़्यादा सटीक अंदाज़ा मिलेगा।
सरकार का फिस्कल कंसॉलिडेशन (fiscal consolidation) का वादा, FY27 के लिए 4.3% डेफिसिट का टारगेट और घटता डेट-टू-जीडीपी रेश्यो, इन्वेस्टर कॉन्फिडेंस को बढ़ाने और लॉन्ग-टर्म ग्रोथ को सपोर्ट करने का लक्ष्य रखते हैं। इससे भारत आने वाले सालों में ग्लोबल इकोनॉमिक एक्सपेंशन (global economic expansion) का एक प्रमुख इंजन बनने की राह पर है।