Uber, Lyft जैसी कंपनियों पर GST का ग्रहण? ऐप-कैब सर्विस पर 5% टैक्स का पेंच, ड्राइवरों की कमाई पर संकट!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Uber, Lyft जैसी कंपनियों पर GST का ग्रहण? ऐप-कैब सर्विस पर 5% टैक्स का पेंच, ड्राइवरों की कमाई पर संकट!
Overview

भारत में ऐप-आधारित कैब सर्विस को लेकर GST (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) ने वित्त मंत्रालय और GST काउंसिल से इस मामले में दखल देने की गुहार लगाई है। IAMAI का कहना है कि ऐप-आधारित कैब सेवाओं पर जो **5% GST** लग रहा है, वह ड्राइवरों की कमाई कम कर रहा है और ग्राहकों के लिए राइड को महंगा बना रहा है।

GST कानून और ऐप-कैब के बीच 'सॉफ्टवेयर' का पेंच?

यह पूरा मामला गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) कानून की धारा 9(5) और ऐप-आधारित कैब एग्रीगेटर्स के सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस (SaaS) मॉडल के बीच एक गहरे संरचनात्मक टकराव से जुड़ा है। IAMAI की मानें तो, धारा 9(5) के तहत इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स ऑपरेटर (ECO) को यात्री परिवहन जैसी सेवाओं पर टैक्स जमा करने के लिए उत्तरदायी ठहराया गया है। लेकिन, IAMAI का तर्क है कि SaaS मॉडल में, एग्रीगेटर सिर्फ़ एक प्लेटफॉर्म या सॉफ्टवेयर एक्सेस देते हैं, और ड्राइवर सीधे यात्रियों से डील करते हैं व पेमेंट लेते हैं। ऐसे में, एग्रीगेटर के लिए राइड की वैल्यू पर 5% GST कलेक्ट करके सरकार को जमा करना संभव नहीं हो पा रहा है। यह अस्पष्टता सिर्फ़ कंप्लायंस का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर इंडस्ट्री में निवेश और प्रतिस्पर्धा को भी प्रभावित कर रही है।

ड्राइवरों की जेब और निवेशकों का भरोसा दोनों पर असर

इस टैक्स पेंच का सीधा असर ड्राइवरों की मेहनत की कमाई पर पड़ रहा है, जो कम हो जाती है। वहीं, ग्राहकों के लिए भी राइड पहले से महंगी हो जाती है। यह अनिश्चित माहौल निवेशकों के लिए भी चिंता का सबब बन रहा है, जो ऐप-आधारित कैब सेक्टर में पैसा लगाना चाहते हैं। बाजार के लिहाज़ से देखें तो, ग्लोबल दिग्गज Uber Technologies Inc. (UBER) का शेयर 7 फरवरी 2026 तक लगभग 14.16 के प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो पर ट्रेड कर रहा था, जबकि Lyft Inc. (LYFT) का P/E रेश्यो 8 फरवरी 2026 को 48.41 के आसपास था। ये आंकड़े इस सेक्टर की वैल्यूएशन में बढ़त की उम्मीदों के साथ-साथ ऐसे रेगुलेटरी जोखिमों को भी दर्शाते हैं।

अनोखे मॉडल और ऐतिहासिक सबक

टैक्स विवाद ने कुछ राज्यों को अनोखे समाधान खोजने पर मजबूर किया है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक जैसे राज्य ने Namma Yatri जैसे ओपन-सोर्स, सब्सक्रिप्शन-आधारित प्लेटफॉर्म को GST देनदारी से छूट दी है। Namma Yatri मॉडल में, ड्राइवर एक फिक्स्ड सब्सक्रिप्शन फीस देते हैं, और यात्री सीधे ड्राइवरों के साथ डील करते हैं। यह मॉडल एग्रीगेटर को सीधे तौर पर फेयर कलेक्शन से बाहर रखता है, जिससे मौजूदा टैक्स अस्पष्टता से बचा जा सकता है।

यह मॉडल ड्राइवरों और ग्राहकों दोनों को आकर्षित कर सकता है जो अधिक वित्तीय स्पष्टता चाहते हैं। इतिहास गवाह है कि राइड-शेयरिंग कंपनियों के शेयर प्रदर्शन पर रेगुलेटरी ख़बरों का गहरा असर पड़ा है। ऐसे में, टैक्स नीति में बड़े बदलाव या लंबी अनिश्चितता निवेशकों के भरोसे और वैल्यूएशन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है। पूरे भारतीय राइड-हेलिंग मार्केट, जिसके भविष्य में ज़बरदस्त ग्रोथ की उम्मीद है, पर यह रेगुलेटरी ओवरहैंग लगातार बना हुआ है। ड्राइवर यूनियनें भी लगातार अपनी आय की अस्थिरता और स्पष्ट किराया ढांचे की मांग को लेकर विरोध कर रही हैं।

क्यों है यह 'बीयर केस' (Bear Case)?

मौजूदा GST व्यवस्था और SaaS-आधारित राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म्स पर इसके अस्पष्ट नियम एग्रीगेटर्स के लिए बड़ी सिस्टमैटिक कमज़ोरी पैदा कर रहे हैं। मुख्य जोखिम धारा 9(5) की व्याख्या में है, जो टैक्स देनदारी इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स ऑपरेटर (ECO) पर डालती है। जब एग्रीगेटर सीधे ड्राइवर-यात्री पेमेंट को सुगम बनाते हैं, तो वे सिर्फ़ सॉफ्टवेयर सेवा दे रहे हैं, न कि परिवहन सेवा, ऐसा कहकर GST के दायरे से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। हालांकि, एडवांस रूलिंग अथॉरिटी (AAR) के विरोधाभासी फैसले और सरकार का रुख एक खतरनाक कंप्लायंस परिदृश्य बनाते हैं। यह अनिश्चितता अप्रत्याशित टैक्स देनदारियों और जुर्माने का कारण बन सकती है, जो सीधे तौर पर मुनाफे को प्रभावित करेगी।

इसके अलावा, Namma Yatri जैसे मॉडल, जो ड्राइवर और यात्री के बीच सीधे भुगतान की व्यवस्था करके धारा 9(5) की टैक्स देनदारी से बच निकलते हैं, वे पारंपरिक एग्रीगेटर-कमीशन मॉडल पर चलने वाले प्लेटफॉर्म्स के लिए एक बड़ी कॉम्पिटिटिव डिसएडवांटेज पैदा करते हैं। यह रेगुलेटरी आर्बिट्रेज Namma Yatri को संभावित रूप से कम GST लागत पर संचालित करने की अनुमति देता है, जिससे Uber और Ola जैसे बड़े खिलाड़ियों पर दबाव बनता है कि वे या तो अपने मॉडल को बदलें या लगातार कंप्लायंस की लड़ाई लड़ें। एक जटिल, एल्गोरिथम-संचालित प्लेटफॉर्म मॉडल पर लगातार निर्भरता, आय और किराया ढांचे को लेकर ड्राइवरों का असंतोष, यह बताता है कि रेगुलेटरी चुनौतियां बनी रहेंगी और यह निवेशकों के लिए एक डी-रेटिंग फैक्टर के रूप में काम कर सकती है जो स्थिर, अनुमानित कमाई की तलाश में हैं।

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