GIFT City: भारत का बड़ा दांव, एविएशन लीजिंग में बनेगा ग्लोबल लीडर, आयरलैंड को देगा सीधी टक्कर!

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AuthorAditya Rao|Published at:
GIFT City: भारत का बड़ा दांव, एविएशन लीजिंग में बनेगा ग्लोबल लीडर, आयरलैंड को देगा सीधी टक्कर!
Overview

भारत, GIFT City को दुनिया के सबसे बड़े एविएशन लीजिंग हब में बदलने की राह पर है। इसके लिए खास लीजिंग कंपनियां (SPVs) बनाई जा रही हैं ताकि एसेट्स को सुरक्षा मिल सके, और लीजिंग कंपनियों को आकर्षित करने के लिए टैक्स छूट को भी बढ़ाया जा रहा है।

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एविएशन लीजिंग में भारत की बड़ी छलांग

भारत अब $187 बिलियन के ग्लोबल एविएशन लीजिंग मार्केट में अपनी खास जगह बनाने की तैयारी में है। गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (GIFT City) को एक ऐसे हब के तौर पर विकसित किया जा रहा है, जो आयरलैंड, सिंगापुर और हांगकांग जैसे स्थापित ऑफशोर सेंटर्स को सीधी टक्कर देगा।

SPVs और टैक्स छूट से लेसरों को मिलेगा बूस्ट

GIFT City में खास SPVs (स्पेशल पर्पज व्हीकल्स) का प्रस्ताव है। ये SPVs लीज पर लिए गए विमानों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी और अगर कोई एयरलाइन मुश्किल में फंसे तो लेसरों (lessors) के लिए विमान वापस पाना आसान बनाएंगी। यह भारत में विमानों को वापस लेने (repossession) की पुरानी दिक्कतों को दूर करने में मदद करेगा।

इसके अलावा, भारत सरकार ने एविएशन लीजिंग फर्मों के लिए टैक्स हॉलिडे (tax holiday) को मौजूदा 10 साल से बढ़ाकर 15 साल कर दिया है। कस्टम ड्यूटी और GST में छूट जैसे फायदों से एयरलाइंस की ऑपरेटिंग कॉस्ट 8-10% तक कम होने की उम्मीद है।

रीपोजिशन के रिस्क पर लगाम

गो फर्स्ट (Go First) एयरलाइंस के इंसॉल्वेंसी (insolvency) मामले के बाद लेसरों को काफी परेशानी हुई थी। IBC मॉरेटोरियम (moratorium) के कारण विमान वापस लेने में लंबी कानूनी लड़ाई और देरी हुई। इसे देखते हुए, भारत ने हाल ही में केप टाउन कन्वेंशन (Cape Town Convention - CTC) को अपनाया है। 'Protection of Interests in Aircraft Objects Bill, 2025' (CTC एक्ट) और एक नोटिफिकेशन के जरिए, CTC के तहत आने वाली संपत्तियों को IBC मॉरेटोरियम से छूट दी गई है। इससे लेसरों के अधिकार मजबूत होंगे और विमानों की रीपोजिशन की प्रक्रिया तेज होगी।

सेक्टर में बूम और ग्लोबल कॉम्पिटिशन

भारत का एविएशन मार्केट 2030 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा डोमेस्टिक मार्केट बनने की ओर अग्रसर है। देश की 80% से ज्यादा कमर्शियल प्लेन्स लीज पर हैं। GIFT City का सिंगल पॉइंट अप्रूवल और 100% फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) की अनुमति वाला ढांचा, इस मार्केट का बड़ा हिस्सा हासिल करने में मदद करेगा। लक्ष्य है कि आयरलैंड की तरह, जो दुनिया के आधे से ज्यादा लीज्ड विमानों को हैंडल करता है, भारत भी इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाए। दिसंबर 2025 तक, GIFT City में 38 लेसर सक्रिय थे, जिन्होंने $5.8 बिलियन के 370 एसेट्स लीज पर दिए थे।

चिंताएं अभी भी बरकरार

कानूनी सुधारों के बावजूद, लेसर अभी भी थोड़े सतर्क हैं। उन्हें इन नए नियमों के प्रैक्टिकल इम्प्लीमेंटेशन (practical implementation) को लेकर चिंता है। हालांकि CTC एक्ट और नोटिफिकेशन से कानूनी रास्ता साफ हुआ है, लेकिन ब्यूरोक्रेटिक डिले (bureaucratic delays) और अदालतों द्वारा कानूनों की व्याख्या अभी भी एक चुनौती बन सकती है। किंगफिशर एयरलाइंस और जेट एयरवेज जैसे पिछले मामलों का अनुभव लेसरों को अभी भी याद है। अगर इन नियमों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया, तो भारतीय एयरलाइंस के लिए रिस्क प्रीमियम बढ़ सकता है। SPVs का बैंकरप्सी-रिमोट (bankruptcy-remote) होना भी भविष्य के इंसॉल्वेंसी मामलों में परखा जाएगा।

भविष्य की ओर: एक ग्लोबल एविएशन फाइनेंस प्लेयर

GIFT City के जरिए भारत का यह कदम, कानूनी और टैक्स संबंधी सुधारों के साथ, उसे ग्लोबल एविएशन फाइनेंस का एक अहम खिलाड़ी बनाने का इरादा साफ दिखाता है। इन सुधारों से विदेशी पूंजी आकर्षित होगी, डोमेस्टिक कैरियर्स की फाइनेंसिंग कॉस्ट कम होगी और एविएशन सेक्टर और मजबूत होगा। अगर यह योजना सफल रही, तो भारत एशिया में एक प्रमुख लीजिंग हब और ग्लोबल स्तर पर एक मजबूत प्रतिस्पर्धी बन सकता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.