तेल की कीमतों में स्थिरता, सरकारी कंपनियों पर घाटे का बोझ
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें $95-96 प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। ऐसे में भारत की सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) भारी नुकसान उठा रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी ₹18 प्रति लीटर पेट्रोल पर और ₹35 प्रति लीटर डीजल पर घाटा झेल रही है। यह स्थिति अप्रैल 2022 से बनी हुई है, जब से सरकार ने आम आदमी को महंगाई से बचाने के लिए फ्यूल प्राइसेज को स्थिर रखा हुआ है। इस फैसले से जहां आम जनता को राहत मिली है, वहीं सरकारी खजाने पर भारी दबाव है। FY27 के लिए 4.3% का फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) का लक्ष्य खतरे में पड़ सकता है, खासकर अगर ऊर्जा कीमतें ऐसे ही ऊंची बनी रहीं।
सरकारी बनाम प्राइवेट: कीमतों का खेल
यह स्थिति सरकारी कंपनियों और प्राइवेट फ्यूल रिटेलर्स के बीच एक बड़ा अंतर दिखाती है। जहां इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (Indian Oil Corporation), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (Bharat Petroleum Corporation) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (Hindustan Petroleum Corporation) जैसी सरकारी कंपनियां दाम स्थिर रखे हुए हैं, वहीं नायरा एनर्जी (Nayara Energy) और शेल (Shell) जैसी प्राइवेट कंपनियों ने पहले ही बढ़ी हुई लागत को उपभोक्ताओं पर डालना शुरू कर दिया है। नायरा एनर्जी ने बाजार के हिसाब से पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए हैं। इसी का नतीजा है कि हाल ही में इंडस्ट्रियल डीजल की कीमतों में करीब ₹22 प्रति लीटर का उछाल आया, जो 20 मार्च 2026 को करीब ₹109.59 तक पहुंच गया। इससे मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे अहम सेक्टर्स पर भी असर पड़ रहा है।
आर्थिक जोखिम बढ़े, दाम स्थिर...
ईंधन की ऊंची कीमतों का असर अर्थव्यवस्था के दूसरे पहलुओं पर भी दिख रहा है। स्टैंडर्ड चार्टर्ड (Standard Chartered) ने भारत की जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) का अनुमान घटाकर FY26 के लिए 7.3% और FY27 के लिए 6.4% कर दिया है। इसका मुख्य कारण ऊंची ऊर्जा कीमतें और मध्य पूर्व में जारी तनाव बताया गया है। महंगाई भी बढ़ रही है, मार्च 2026 CPI 3.4% था, जो ऊर्जा झटके के कारण अप्रैल तक 4% से ऊपर जाने की उम्मीद है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना (लगभग 93.0080 अप्रैल 2026 तक) तेल आयात को और महंगा बना रहा है, क्योंकि भारत अपनी 88% तेल की जरूरतें आयात से पूरी करता है। इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है, जिसके FY27 तक 1.8% तक पहुंचने का अनुमान है। अगर ग्लोबल यील्ड्स (Global Yields) बढ़ती हैं, तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India - RBI) को ब्याज दरें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ सकता है। साथ ही, फर्टिलाइजर सब्सिडी (Fertilizer Subsidy) में बढ़ोतरी और एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) में संभावित कटौती से सरकारी बजट पर भी दबाव बढ़ रहा है।
आयात पर निर्भरता और अस्थिरता
लगातार अस्थिर ग्लोबल क्रूड कीमतों के बावजूद फ्यूल प्राइसेज को स्थिर रखना एक गहरी, संरचनात्मक समस्या को छुपाता है। भारत का कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भरता (2025 में 88%) उसे वैश्विक मूल्य झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। ओएमसी (OMC) के माध्यम से घाटे को सोखने की सरकार की रणनीति वित्तीय रूप से काफी बोझिल और टिकाऊ नहीं है। यह नीति न केवल ओएमसी के वित्तीय स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है, बल्कि निवेश की उनकी क्षमता को भी कम कर रही है। साथ ही, यह बाजार की कीमतों को भी विकृत कर रही है। पेट्रोलियम पर सरकारी टैक्स रेवेन्यू, जो FY23 में केंद्रीय कर राजस्व का 18% था, वह भी एक्साइज ड्यूटी में और कटौती की स्थिति में खतरे में है। फिस्कल डेफिसिट का बढ़ना, मुद्रा का अवमूल्यन और केवल ईंधन ही नहीं, बल्कि व्यापक मुद्रास्फीति का खतरा देश की आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर चिंता का विषय है। रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) जैसी प्राइवेट कंपनियां भी ऊंचे कच्चे माल की लागत के कारण रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव महसूस कर रही हैं।
दाम बढ़ने की आशंका, कब तक रहेगी स्थिरता?
विश्लेषकों का मानना है कि उपभोक्ता कीमतों को स्थिर रखने का यह दौर जल्द ही खत्म होने वाला है। राज्य चुनावों के बाद, खुदरा ईंधन की कीमतों को बढ़ाने का दबाव बढ़ने की उम्मीद है। स्टैंडर्ड चार्टर्ड (Standard Chartered) ने अनुमान लगाया है कि अगर वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी नरमी आती है, तो मई और जून 2026 में खुदरा ईंधन की कीमतों में 5% की बढ़ोतरी हो सकती है। 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) के औसत अनुमान $60/bbl से लेकर $96/bbl तक हैं, लेकिन अधिकांश विश्लेषक कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की उम्मीद कर रहे हैं। घाटे को सोखने की वर्तमान रणनीति टिकाऊ नहीं है, जिससे पंप पर कीमतों में महत्वपूर्ण वृद्धि की संभावना बढ़ जाती है। इसका तत्काल असर महंगाई और आर्थिक विकास के अनुमानों पर पड़ेगा। बाजार अब चुनावों के बाद की नीतिगत फैसलों और वैश्विक तेल कीमतों की चाल पर बारीकी से नजर रखेगा।
