भारत के माल ढुलाई क्षेत्र पर मंडरा रहा उत्सर्जन का भारी संकट: नई रिपोर्ट का दावा

TRANSPORTATION
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
भारत के माल ढुलाई क्षेत्र पर मंडरा रहा उत्सर्जन का भारी संकट: नई रिपोर्ट का दावा
Overview

भारत के माल ढुलाई (Freight) सेक्टर में साल **2047** तक कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन लगभग **400%** तक बढ़ सकता है। इस चिंताजनक स्थिति के पीछे मुख्य वजह उत्सर्जन को मापने के लिए कोई एक तय और व्यवस्थित तरीका न होना है।

उत्सर्जन के तूफान का सामना

स्मार्ट फ्लीट सेंटर (SFC) इंडिया, एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) और IIM-बेंगलुरु के संयुक्त तत्वावधान में आई एक नई रिपोर्ट ने भारत के लॉजिस्टिक्स सेक्टर के लिए एक बड़ी चेतावनी जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो साल 2047 तक देश में माल ढुलाई से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में 400% की भारी बढ़ोतरी हो सकती है। इस समस्या की जड़ है उत्सर्जन को मापने के तरीकों में भारी अव्यवस्था और तालमेल की कमी, जो डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) यानी कार्बन उत्सर्जन कम करने की कोशिशों में सबसे बड़ी रुकावट बन रही है।

मापन (Measurement) की पहेली

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारत के लॉजिस्टिक्स सिस्टम में उत्सर्जन का हिसाब-किताब रखने के तरीके बेहद बिखरे हुए हैं। कंपनियां अलग-अलग तरीके अपना रही हैं, उत्सर्जन के आंकड़े (emission factors) अलग-अलग इस्तेमाल कर रही हैं और रिपोर्टिंग की सीमाएं भी तय नहीं हैं। इस वजह से सटीक तुलना करना और ठोस कदम उठाना लगभग नामुमकिन हो गया है। यह अव्यवस्था कॉर्पोरेट जगत के लिए अपनी रिपोर्टिंग को विश्वसनीय बनाने और सरकार के लिए नीतियां बनाने में बाधा डालती है।

समाधान क्या है?

इस समस्या से निपटने के लिए, "पाथवेज फॉर क्लीन फ्लीट प्रोग्राम्स एंड पॉलिसी इंटीग्रेशन" (Pathways for Clean Freight Programs and Policy Integration) नाम की इस रिपोर्ट में एक राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत (harmonized) माल ढुलाई उत्सर्जन लेखांकन (freight emissions accounting) ढांचा (framework) तैयार करने की वकालत की गई है। यह ढांचा ग्लोबल स्टैंडर्ड्स जैसे ISO 14083 और ग्लोबल लॉजिस्टिक्स एमिशन्स काउंसिल (GLEC) फ्रेमवर्क के अनुरूप होना चाहिए। ये ग्लोबल स्टैंडर्ड्स ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को मापने के लिए वैज्ञानिक तरीके बताते हैं, जो सभी तरह के ट्रांसपोर्ट मोड पर लागू होते हैं।

इसके अलावा, रिपोर्ट में भारत के लिए विशेष उत्सर्जन कारक (India-specific emission factors) विकसित करने और एक डिजिटल मॉनिटरिंग, रिपोर्टिंग और वेरिफिकेशन (MRV) सिस्टम बनाने की बात कही गई है। इन कदमों से ही उत्सर्जन को कम करने की ठोस रणनीतियाँ बनाई जा सकती हैं। इसके बिना, डीकार्बोनाइजेशन के प्रयास अंधेरे में तीर चलाने जैसे होंगे।

नीतिगत समन्वय और वैश्विक तालमेल

भारत का लॉजिस्टिक्स सेक्टर तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था, ई-कॉमर्स के विस्तार और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट का अहम हिस्सा है। लेकिन इस ग्रोथ के साथ ही माल ढुलाई की मांग और उससे होने वाला प्रदूषण भी बढ़ रहा है। फिलहाल, सड़क मार्ग (road freight) से होने वाली ढुलाई का दबदबा सबसे ज़्यादा है, जिससे प्रदूषण का स्तर भी काफी बढ़ जाता है।

यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब भारत सरकार नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी (NLP) और पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान जैसे बड़े कदम उठा रही है। इन पहलों का मकसद लॉजिस्टिक्स को और ज़्यादा कुशल और कनेक्टेड बनाना है। अगर इन पहलों में उत्सर्जन की गिनती का एक पक्का तरीका जोड़ा जाए, तो ये अपने सस्टेनेबिलिटी (sustainability) लक्ष्यों को और मजबूती से हासिल कर पाएंगी।

दुनिया भर में, बेहतर तरीकों में भारी सामान को रेलवे से ले जाना, पोर्ट्स (ports) को इलेक्ट्रिक बनाना और वैकल्पिक ईंधनों (alternative fuels) का इस्तेमाल करना शामिल है। भारत भी डेडिकेटेड फ्लीट कॉरिडोर्स (DFCs) जैसे प्रोजेक्ट्स के ज़रिए सड़क से रेल की ओर माल ढुलाई को बढ़ावा दे रहा है, जिससे उत्सर्जन में काफी कमी आ सकती है। GLEC फ्रेमवर्क और ISO 14083 जैसे मानक दुनिया भर में अपनाए जा रहे हैं, जो उत्सर्जन रिपोर्टिंग में तुलनात्मकता और पारदर्शिता बढ़ाते हैं।

धरातलीय चुनौतियाँ

रिपोर्ट में बताए गए समाधानों को लागू करने में कई बड़ी चुनौतियाँ हैं। भारत का माल ढुलाई सेक्टर बहुत बिखरा हुआ है, जिसमें छोटे और मध्यम आकार के फ्लीट ऑपरेटरों की बड़ी संख्या है। इन ऑपरेटरों के पास अक्सर जरूरी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सिस्टम नहीं होते, जो सटीक उत्सर्जन लेखांकन के लिए ज़रूरी हैं।

भारत में पर्यावरण नीतियों को लागू करने में हमेशा से ही समन्वय की कमी, राज्यों और स्थानीय स्तर पर वित्तीय और तकनीकी क्षमता की कमी और लागू करने में मुश्किलों जैसी दिक्कतें रही हैं। साफ-सुथरी तकनीकों (cleaner technologies) को अपनाने में वित्तीय बाधाएं भी हैं। छोटे ऑपरेटरों के लिए ग्रीन फाइनेंस (green finance) तक पहुंच मुश्किल है, और कम कार्बन वाले ईंधन व इलेक्ट्रिक वाहनों की लागत अभी भी पारंपरिक डीजल वाहनों से ज़्यादा है। इसके अलावा, चार्जिंग या फ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (charging or fueling infrastructure) की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।

यह चिंताजनक है कि 85% ट्रकों के मालिक छोटे ऑपरेटर हैं, और 12-14% जीडीपी का हिस्सा लॉजिस्टिक्स लागत में जाता है, जो वैश्विक औसत से कहीं ज़्यादा है। ऐसे में, एक समन्वित, पूरे सेक्टर में ग्रीन टेक्नोलॉजी को अपनाने और सटीक उत्सर्जन ट्रैकिंग के बिना, भारत के 2070 तक नेट-ज़ीरो (net-zero) लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

आगे का रास्ता

यह रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि उत्सर्जन का विश्वसनीय लेखांकन (credible emissions accounting) केवल एक रिपोर्टिंग का काम नहीं है, बल्कि यह प्रभावी क्लीन फ्लीट कार्यक्रमों की नींव है। यह बड़े पैमाने पर उत्सर्जन लेखांकन को कार्रवाई योग्य (actionable) बनाने के लिए एक व्यावहारिक खाका (blueprint) पेश करती है, जिससे खास उपायों (targeted interventions) को सही आधार मिल सके।

इस लेखांकन व्यवस्था को संस्थागत बनाने से भारत डीकार्बोनाइजेशन के लिए एक विश्वसनीय आधार तैयार कर सकता है, उभरते कार्बन बाज़ारों (carbon markets) में भाग ले सकता है और अपने लॉजिस्टिक्स सेक्टर को वैश्विक सस्टेनेबिलिटी मानदंडों (global sustainability norms) के साथ संरेखित (align) कर सकता है। इस पहल का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत के लॉजिस्टिक्स का विस्तार कम और शून्य-उत्सर्जन माल परिवहन (low- and zero-emission freight transport) के एक विश्वसनीय रास्ते के साथ हो, जिससे यह सेक्टर भविष्य की प्रकटीकरण आवश्यकताओं (disclosure requirements) और कड़े कार्बन जवाबदेही मानकों (carbon accountability standards) के लिए तैयार हो सके।

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