हॉरमुज़ के जोखिम भरे रास्ते पर भारत
यह घटना भारत की ऊर्जा सुरक्षा (energy security) की नाजुक स्थिति को दर्शाती है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों के कारण महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों पर खतरा मंडरा रहा है। राजनयिक प्रयासों से एक अस्थायी गलियारा जरूर खुला है, लेकिन यह भेद्यता बनी हुई है। भविष्य में इस रास्ते से जहाजों का गुजरना पूरी तरह से क्षेत्रीय राजनीति और ईरान के फैसलों पर निर्भर करेगा।
ईरान की मंजूरी से मिली 'ग्रीन संवि' को राह
हाल ही में 'ग्रीन संवि' (Green Sanvi) नामक भारतीय झंडे वाले एलपीजी टैंकर ने ईरान के क्षेत्रीय जल का उपयोग करते हुए हॉरमुज़ जलडमरूमध्य को पार किया। ईरान ने यह स्पष्ट किया है कि यह जलडमरूमध्य 'मित्र राष्ट्रों' जैसे भारत के लिए खुला रहेगा। यह ऊर्जा आयात के लिए एक महत्वपूर्ण, यद्यपि अस्थायी, अवसर प्रदान करता है। इस संवेदनशील मार्ग से गुजरने के लिए अब भारतीय पहचान का प्रदर्शन एक सामान्य बात बन गई है।
यह मार्ग भारत की भारी निर्भरता को उजागर करता है, क्योंकि देश की ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा इसी एक रणनीतिक बिंदु (chokepoint) से होकर गुजरता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत की लगभग 90% एलपीजी (LPG) और 40-50% कच्चा तेल (crude oil) की जरूरतें इसी संकीर्ण जलडमरूमध्य से पूरी होती हैं। स्थिति बेहद जोखिम भरी है, क्योंकि क्षेत्रीय राजनीति या ईरानी नीति में कोई भी बदलाव इन महत्वपूर्ण प्रवाहों को तुरंत खतरे में डाल सकता है।
भारत के ऊर्जा आयात की बड़ी कमजोरी
हॉरमुज़ जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के लगभग 20% वैश्विक तेल व्यापार और एलपीजी (LPG) व एलएनजी (LNG) की बड़ी मात्रा गुजरती है, वहां किसी भी रुकावट से भारत दुनिया के सबसे कमजोर देशों में से एक बन जाता है। भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों को 41 देशों तक विविध किया है (जो पहले 27 थे), लेकिन फिर भी अधिकांश सप्लाई इसी रास्ते से आती है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने पहले ही तेल की कीमतों को $120 प्रति बैरल के करीब पहुंचा दिया है और व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के लिए एलपीजी की कीमतों में उछाल आया है, जिसका असर व्यवसायों और संभावित रूप से घरेलू बजट पर पड़ रहा है।
इतिहास गवाह है कि ऐसे रणनीतिक बिंदुओं पर पिछली रुकावटों ने गंभीर आर्थिक समस्याएं पैदा की हैं। अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं जैसे चीन, जापान और दक्षिण कोरिया को भी ऐसे ही जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, चीन जैसी अर्थव्यवस्थाएं कोयला और विद्युतीकरण पर अधिक जोर देकर बेहतर सुरक्षा कवच बना रही हैं, जबकि भारत की ऊर्जा रणनीति अभी भी ऐसे मार्गों से जुड़ी है जहां भू-राजनीतिक प्रभाव अधिक है।
व्यवस्थागत जोखिमों का खुलासा
हॉरमुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए ईरान की मंजूरी पर निर्भरता भारत के लिए एक बड़ी व्यवस्थित कमजोरी (systemic weakness) है। यह निर्भरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा को पश्चिम एशिया की अस्थिर राजनीतिक स्थिति से जोड़ती है। ईरान का 'मित्र राष्ट्रों' के लिए रास्ता खोलना और दूसरों को रोकना दर्शाता है कि यह पहुंच लेन-देन पर आधारित है। इसका मतलब है कि मैत्रीपूर्ण संबंध समाप्त हो सकते हैं, जिससे तत्काल आपूर्ति की कमी हो सकती है। भारत की आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) में अन्य विविध प्रणालियों की तुलना में बहुत कम बैकअप है। इसके अलावा, भारत का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (strategic petroleum reserves), जो केवल 9-10 दिनों की खपत के लिए पर्याप्त है, लंबी रुकावटों के खिलाफ एक छोटा बफर प्रदान करता है। एलपीजी और डीजल जैसे उत्पाद, डिलीवरी की चुनौतियों और बुनियादी ढांचे को संभावित नुकसान के कारण, कच्चे तेल की तुलना में जलडमरूमध्य बंद होने से अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। जहां भारत सौर ऊर्जा और विद्युतीकरण में तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं इसके औद्योगिक क्षेत्र की आयातित जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता और देश की समग्र आयात निर्भरता ऊर्जा-समृद्ध राष्ट्रों की तुलना में एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय बनी हुई है।
आगे की राह
हालांकि वर्तमान राजनयिक प्रयासों ने कुछ जहाजों के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किया है, लेकिन भारत की ऊर्जा आपूर्ति के अंतर्निहित जोखिम अभी भी बने हुए हैं। जब तक क्षेत्रीय तनाव उच्च बना रहेगा, बाजार ऊर्जा और शिपिंग लागतों में लगातार उतार-चढ़ाव की उम्मीद कर रहे हैं। विश्लेषकों का सुझाव है कि भारत को भविष्य के झटकों के लिए तैयार रहने के लिए अपने रणनीतिक भंडार (strategic reserves) को बढ़ाना चाहिए और समुद्री मार्गों से हटकर विविधीकरण (diversification) में तेजी लानी चाहिए। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि भारत की ऊर्जा पहुंच सुरक्षित करना केवल एक लॉजिस्टिक्स का मुद्दा नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक आवश्यकता है, जिसके लिए जोखिम भरे वैश्विक परिदृश्य में इसकी ऊर्जा नीति में निरंतर समायोजन की आवश्यकता होगी।