आर्थिक मजबूरी बन रही EV बसों की वजह
भारत में इंटरसिटी ट्रांसपोर्ट में ग्रीन एनर्जी की ओर कदम सिर्फ सरकारी नीतियों की वजह से नहीं, बल्कि आर्थिक जरूरत के चलते उठाया जा रहा है। दुनिया भर में चल रहे तनाव के कारण डीजल के बढ़ते दाम प्राइवेट बस ऑपरेटरों के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। इस प्राइस वोलेटिलिटी ने इलेक्ट्रिक बसों को ऑपरेशनल रिस्क को मैनेज करने का एक अहम जरिया बना दिया है। redBus के आंकड़ों के मुताबिक, इलेक्ट्रिक बसों की उपलब्धता में पिछले साल के मुकाबले 33% की बढ़ोतरी हुई है, खासकर उन रूट्स पर जहां चार्जिंग का शेड्यूल तय रहता है।
इलेक्ट्रिक बसों के लिए फंडिंग की बड़ी चुनौती
इलेक्ट्रिफिकेशन की मजबूत कोशिशों के बावजूद, इलेक्ट्रिक बसों को खरीदने के लिए जरूरी कैपिटल जुटाने और बसों की चाहत के बीच एक बड़ा गैप है। करीब 95% इलेक्ट्रिक बस मालिकों को डीजल बसों के मुकाबले फंड जुटाने में ज्यादा मुश्किल हो रही है। इसके मुख्य कारण हैं - ज्यादा शुरुआती लागत, जो अक्सर डीजल बसों से दोगुनी होती है, और लोन की शर्तें। ज्यादातर लोन की रीपेमेंट अवधि 4 से 7 साल की होती है, जो इलेक्ट्रिक एसेट्स की लंबी लाइफ से मेल नहीं खाती। सोलर या हाईवे जैसे सेक्टर्स के विपरीत, इलेक्ट्रिक बस इंडस्ट्री में क्रेडिट रिस्क को कम करने के लिए सरकार की तरफ से पेमेंट सिक्योरिटी का अभाव है। इसकी वजह से ऑपरेटरों को कैश फ्लो की समस्या और ज्यादा वर्किंग कैपिटल की जरूरत का सामना करना पड़ रहा है।
अंदरूनी कमजोरियां मुनाफे पर डाल रहीं खतरा
निवेशकों को इलेक्ट्रिक बस अडॉप्शन के मौजूदा ट्रेंड की प्रॉफिटेबिलिटी को लेकर सतर्क रहना चाहिए। हालांकि, इलेक्ट्रिक बस के मालिक होने की कुल लागत लंबे समय में कम हो सकती है, लेकिन इंटीग्रेटेड चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण यह फायदा अक्सर खत्म हो जाता है। कई ऑपरेटर हाई-कैपेसिटी, भरोसेमंद पावर सप्लाई तक पहुंचने में संघर्ष करते हैं। 'पे-एज-यू-गो' पेमेंट मांगने वाले लीजिंग मॉडल मैन्युफैक्चरर्स और फाइनेंस फर्मों के लिए कर्ज को छिपा सकते हैं। यूज्ड इलेक्ट्रिक बसों का मार्केट भी लगभग न के बराबर है, जिससे रीसेल वैल्यू को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है। अगर ऑयल की कीमतें गिरती हैं या सब्सिडी में बदलाव होता है, तो फ्लीट रिप्लेसमेंट के लिए सरकारी मैंडेट के बिना, यह ट्रांजिशन धीमा पड़ सकता है। परफॉरमेंस भी एक चिंता का विषय है: मौजूदा बैटरी रेंज 250-300 किलोमीटर अक्सर असली मुनाफे के लिए जरूरी 400 किलोमीटर की डेली जरूरत से कम पड़ती है।
भविष्य का ग्रोथ रेगुलेशन और इंफ्रा पर निर्भर
इलेक्ट्रिक बस मार्केट कंसॉलिडेट हो रहा है। जहां Tata Motors जैसी कंपनियां शुरुआती लीडर रहीं, वहीं PMI Electro, JBM Auto, और Switch Mobility जैसे नए प्लेयर्स सरकारी प्रोक्योरमेंट प्रोग्राम्स जैसे PM E-DRIVE स्कीम्स से फायदा उठा रहे हैं। भविष्य का ग्रोथ प्रोक्योरमेंट सब्सिडी पर कम और ब्याज दरों में कमी और स्टैंडर्डाइज्ड चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा निर्भर करेगा। इन बदलावों के बिना, यह इंडस्ट्री तेजी से ग्रोथ और भारी अंडरकैपिटलाइजेशन के दौरों के बीच झूल सकती है।
