ऑपरेशनल एफिशिएंसी और सेफ्टी को कैसे मिलेगी धार?
Indian Railways ने पुराने मैकेनिकल सिग्नलिंग सिस्टम को हटाकर स्टेट-ऑफ-द-आर्ट इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम लगाए हैं। दिसंबर 2025 तक 6,660 से ज़्यादा स्टेशनों पर इन्हें इंस्टॉल किया जा चुका है। सुरक्षा को और मज़बूत करते हुए 10,097 लेवल क्रॉसिंग गेट्स को भी इंटरलॉकिंग सिस्टम से सुरक्षित किया गया है। ट्रैक की रियल-टाइम जानकारी के लिए 6,665 स्टेशनों पर ट्रैक सर्किटिंग को एक्टिवेट किया गया है।
इसके अलावा, 6,625 रूट किलोमीटर पर ऑटोमेटिक ब्लॉक सिग्नलिंग (ABS) को डिप्लॉय किया गया है, जिससे बिना नई पटरियां बिछाए ट्रेनों की कैपेसिटी और थ्रूपुट बढ़ेगा। ब्लॉक प्रूविंग एक्सेल काउंटर्स (BPAC) को 6,142 ब्लॉक सेक्शंस पर लगाया गया है, जो ट्रेन क्लीयरेंस को ऑटोमेट करता है और मानवीय गलतियों की संभावना को कम करता है। इन सब कोशिशों का नतीजा यह है कि पिछले एक दशक में सिग्नलिंग फेलियर्स में करीब 58% की भारी कमी आई है, और ओवरऑल एक्सीडेंट्स में भी बड़ी गिरावट देखी गई है।
इंफ्रास्ट्रक्चर का बूस्टर डोज: इन्वेस्टमेंट और ग्रोथ
यह सिग्नलिंग मॉडर्नाइजेशन Indian Railways के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंडा का एक अहम हिस्सा है। आने वाले 5 सालों में रेलवे में ₹10-12 लाख करोड़ के भारी-भरकम इन्वेस्टमेंट की योजना है। हालिया यूनियन बजट 2026-27 में रेलवे के कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) के लिए रिकॉर्ड ₹2.77 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो पिछले साल से 10.25% ज़्यादा है।
यह बड़ा खर्च सिर्फ ट्रेन ऑपरेशन्स को बेहतर बनाने के लिए नहीं है, बल्कि यह इकोनॉमी को भी ज़बरदस्त बूस्ट देगा। मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और टेक्नोलॉजी जैसे सेक्टर्स में ग्रोथ को पंख लगेंगे। रेलवे इक्विपमेंट, सिग्नलिंग सिस्टम्स और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट से जुड़ी कंपनियों को इस मजबूत ऑर्डर पाइपलाइन से सीधा फायदा होगा। ग्लोबल रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम मार्केट, जो 2034 तक USD 42.4 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, में इंडिया एक बड़ा ग्रोथ ड्राइवर बन रहा है।
ईटीसीएस (ETCS) और एआई-ड्रिवेन प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस जैसी एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज़ का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। साथ ही, सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर बनाने की योजना है, जिसमें करीब ₹16-20 लाख करोड़ का इन्वेस्टमेंट होगा।
क्या हैं खतरे और चुनौतियाँ?
इतने बड़े सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में जोखिम तो जुड़े होते ही हैं। Indian Railways के इस मॉडर्नाइजेशन में प्रोजेक्ट्स में देरी, रॉ मटेरियल (जैसे स्टील और सीमेंट) के बढ़ते दाम की वजह से कॉस्ट ओवररन्स, और लैंड एक्विजिशन की दिक्कतों जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
कुछ बड़ी कंपनियों पर स्पेशलाइज्ड कंपोनेंट्स और टेक्निकल एग्जीक्यूशन के लिए निर्भरता भी एक बॉटलनेक बन सकती है। सरकार नाबफिड (NaBFID) जैसी संस्थाओं से फाइनेंसिंग बढ़ा रही है, लेकिन प्राइवेट कैपिटल को आकर्षित करना भी ज़रूरी है, क्योंकि इतने बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए प्राइवेट सेक्टर की क्षमता सीमित हो सकती है। रेगुलेटरी अनसर्टेनिटी और राज्यों के बीच कोऑर्डिनेशन की ज़रूरत भी प्रोजेक्ट्स की तेज़ गति को धीमा कर सकती है।
आगे का रास्ता
Indian Railways और इससे जुड़े सेक्टर का भविष्य काफी ब्राइट दिख रहा है, जिसका मुख्य कारण सरकार का लगातार फोकस और भारी बजट एलोकेशन है। FY27 के लिए ₹2.77 लाख करोड़ का कैपिटल एक्सपेंडिचर, नई लाइन कंस्ट्रक्शन, रोलिंग स्टॉक प्रोक्योरमेंट और हाई-SPEED व डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के एक्सपेंशन की योजनाओं को दर्शाता है।
कवच (Kavach) जैसे स्वदेशी ऑटोमेटेड ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम का डेवलपमेंट और डिप्लॉयमेंट, देश की सेल्फ-रिलायन्स और सेफ्टी बढ़ाने की मंशा को दिखाता है। एनालिस्ट्स उम्मीद कर रहे हैं कि रेलवे सेक्टर में लगातार ग्रोथ बनी रहेगी, जो मॉडर्नाइजेशन और पैसेंजर व फ्रेट वॉल्यूम्स में बढ़ोतरी से आगे बढ़ेगी। फोकस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके एक सेफर, ज़्यादा एफिशिएंट और इकोनॉमिकली वाइटल नेशनल ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क बनाने पर है।