Indian Railways: रिकॉर्ड कैपेक्स के बावजूद बड़ा घाटे का डर, जानें क्या है रेल मंत्रालय की चिंता

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AuthorNeha Patil|Published at:
Indian Railways: रिकॉर्ड कैपेक्स के बावजूद बड़ा घाटे का डर, जानें क्या है रेल मंत्रालय की चिंता
Overview

Indian Railways के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। भारी सरकारी निवेश (Capex) और ग्रोथ के बड़े लक्ष्यों के बावजूद, रेलवे की वित्तीय सेहत नाजुक बनी हुई है। कर्मचारियों के भारी खर्चे और आय के सीमित साधनों के चलते एक स्ट्रक्चरल रेवेन्यू-कॉस्ट असंतुलन लंबे समय तक चिंता का सबब बन सकता है।

ऑपरेटिंग रेशियो का आईना

रेलवे का ऑपरेटिंग रेशियो, यानी आमदनी का कितना हिस्सा खर्चों में चला जाता है, वो अभी भी अलार्मिंग लेवल पर है। फाइनेंशियल ईयर 2024-25 के लिए यह रेशियो लगभग 98.22% रहा। इसका मतलब है कि रेलवे ने जो कमाया, उसका लगभग हर रुपया ऑपरेशनल खर्चे में ही चला गया, जिससे सिर्फ ₹2,660 करोड़ का मामूली सरप्लस बचा। यह पिछले साल से थोड़ा बेहतर है, लेकिन ग्लोबल बेंचमार्क के मुकाबले बहुत ऊंचा है, जहां 85% से ऊपर का ऑपरेटिंग रेशियो बाहरी मदद की जरूरत का संकेत देता है। अगले फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए भी यह रेशियो 98.42% रहने का अनुमान है। रेलवे का टारगेट ग्रॉस ट्रैफिक रिसीट (Gross Traffic Receipt) FY24-25 में ₹2,65,114 करोड़ है। यह तंग मार्जिन यात्रियों का किराया बढ़ाने जैसे फैसलों को मुश्किल बना देता है, खासकर तब जब एयरलाइन और रोड ट्रांसपोर्ट से कड़ी टक्कर मिल रही हो।

खर्चों का पहाड़: सैलरी और पेंशन का बोझ

भारतीय रेलवे के खर्चे का सबसे बड़ा हिस्सा हमेशा से सैलरी और पेंशन पर रहा है। पिछले एक दशक से, यह करीब 65% से 70% रेवेन्यू खा जाता है, और FY27 तक भी यह 68% रहने का अनुमान है। FY24-25 में, स्टाफ सैलरी पर 42% और पेंशन पर 23% रेवेन्यू खर्च हुआ, जबकि अभी भी कई पद खाली पड़े हैं। यह भारी फिक्स्ड कॉस्ट रेलवे की वित्तीय फ्लेक्सिबिलिटी को बहुत कम कर देती है। दुनिया भर के रेलवे सिस्टम में जहां कॉस्ट स्ट्रक्चर ज्यादा डायवर्सिफाइड होता है, वहीं भारतीय रेलवे के लिए यह एक अनूठी चुनौती है।

आमदनी का एक ही रास्ता: कोल और बल्क कमोडिटीज़ पर निर्भरता

रेलवे की फ्रेट रेवेन्यू (माल ढुलाई से आमदनी) काफी हद तक कुछ खास बल्क कमोडिटीज़, खासकर कोयले पर निर्भर है। ऐतिहासिक रूप से, कोयला फ्रेट रेवेन्यू का लगभग 40-45% और मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा रहा है। हालांकि कोयला मूवमेंट में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन पावर प्लांट्स में हाई स्टॉक और लॉजिस्टिक्स की वजह से इसकी रेवेन्यू में हिस्सेदारी कम होने के संकेत मिल रहे हैं। FY27 के लिए यात्री रेवेन्यू में 9.1% और फ्रेट रेवेन्यू में 5.8% ग्रोथ का अनुमान है, लेकिन हाल के रुझान बताते हैं कि फ्रेट रेवेन्यू Q1 FY26 में फ्लैट रहा है। 2027 तक 3,000 मिलियन टन फ्रेट के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोयले, सीमेंट और आयरन ओर के अलावा अन्य गैर-पारंपरिक कमोडिटीज़ को भी जोड़ना होगा। फिलहाल, भारत में एवरेज फ्रेट रेट 10.15 US सेंट प्रति RTM है, जो चीन (3.51 सेंट) और रूस (3.26 सेंट) से काफी ज्यादा है, जिससे गैर-बल्क सेगमेंट में कॉम्पिटिटिवनेस कम हो सकती है।

सरकारी सहारा और IRFC का कर्ज़

सरकार रेलवे में भारी निवेश कर रही है। FY27 के लिए रिकॉर्ड ₹2.93 लाख करोड़ का कैपेक्स आवंटित किया गया है, जिसका फोकस हाई-SPEED रेल और फ्रेट एफिशिएंसी पर है। इसमें नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का निर्माण शामिल है। रेलवे का फाइनेंसिंग आर्म, इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IRFC) अपनी मजबूत क्रेडिट रेटिंग (S&P से BBB-) और सरकारी मालिकाना हक के कारण अच्छी स्थिति में है। मार्च 2025 तक इसका कैपिटल-टू-रिस्क वेटेड रेशियो (CRAR) 673% था। हालांकि, IRFC का डेट-टू-इक्विटी रेशियो अभी भी काफी ऊंचा है, जो मार्च 2025 तक लगभग 7.83 था। हाल के वर्षों में इसका नेट डेट-टू-इक्विटी रेशियो 880% से ऊपर रहा है, जो भारी लेवरेज को दर्शाता है।

कमजोरियां और बड़े जोखिम

रेलवे की सबसे बड़ी कमजोरी इसका इनफ्लेक्सिबल कॉस्ट स्ट्रक्चर है। सैलरी और पेंशन अकेले दो-तिहाई से ज्यादा रेवेन्यू ले लेते हैं, जिससे इंटरनल फंड से कैपिटल इन्वेस्टमेंट के लिए गुंजाइश बहुत कम बचती है। 8वें पे कमीशन की रिपोर्ट से यह बजट और भी टाइट हो सकता है।

दूसरी ओर, कोयले और अन्य बल्क कमोडिटीज़ पर फ्रेट रेवेन्यू की निर्भरता एक स्ट्रैटेजिक कमजोरी है। FMCG, ई-कॉमर्स और कंटेनर ट्रैफिक जैसे सेक्टर में डायवर्सिफिकेशन एक लक्ष्य है, लेकिन इस रेवेन्यू मिक्स को बदलना आसान नहीं है। मौजूदा फ्रेट रेट्स इन हाई-वैल्यू, टाइम-सेंसिटिव गुड्स के लिए कॉम्पिटिटिव नहीं हो सकते, जो बेहतर लास्ट-माइल कनेक्टिविटी के कारण रोड ट्रांसपोर्ट को चुन रहे हैं। लगातार हाई ऑपरेटिंग रेशियो का मतलब है कि कोयले की डिमांड में कोई भी बड़ी गिरावट या यात्री सेवाओं पर सब्सिडी (लगभग ₹60,000 करोड़ सालाना) में बढ़ोतरी से वित्तीय स्थिति और भी खराब हो सकती है। IRFC का भारी कर्ज़, भले ही सरकारी समर्थन प्राप्त हो, एक बड़ी वित्तीय देनदारी है।

आगे क्या? उम्मीदें और चुनौतियाँ

भारतीय रेलवे नए हाई-SPEED रेल और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के साथ बड़े कैपेक्स के रास्ते पर है। सरकार का इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर जोर आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए मजबूत आधार प्रदान करता है। रेलवे नॉन-फेयर रेवेन्यू और स्टेशन डेवलपमेंट व फ्रेट लॉजिस्टिक्स में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बढ़ाकर नए रेवेन्यू स्ट्रीम्स तलाश रहा है। हालांकि, महत्वाकांक्षी फ्रेट वॉल्यूम लक्ष्यों को हासिल करने और लंबी अवधि की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए, पारंपरिक बल्क कार्गो से आगे बढ़कर रेवेन्यू बेस को डायवर्सिफाई करना और अपने भारी फिक्स्ड कॉस्ट को रणनीतिक रूप से मैनेज करना होगा। यह एक ऐसी चुनौती है जिसके लिए सिर्फ ऑपरेशनल एफिशिएंसी से कहीं ज्यादा की जरूरत होगी।

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