कैपिटल गैप को भरेगी नई पॉलिसी
ये बदलाव सिर्फ पॉलिसी में एक छोटा-मोटा अपडेट नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय रेलवे के महत्वाकांक्षी विस्तार के लिए ज़रूरी प्राइवेट कैपिटल को जुटाने की एक सोची-समझी कोशिश है। रेलवे की मौजूदा फाइनेंशियल हालत, जिसमें ऑपरेटिंग सरप्लस (operating surplus) कम है और सरकार के बजटरी सपोर्ट (budgetary support) पर ज़्यादा निर्भरता है, ऐसे स्ट्रेटेजिक बदलावों की मांग करती है। 2030 तक रेलवे नेटवर्क को बड़ा करने और मॉडर्नाइज़ करने के लिए अनुमानित ₹50 लाख करोड़ के भारी कैपिटल फंडिंग गैप (capital funding gap) को पाटना ज़रूरी है। प्रोजेक्ट्स से जुड़े रिस्क, खासकर ज़मीन अधिग्रहण के, कम करके और लंबी कंसेशन पीरियड (concession period) देकर, रेलवे का लक्ष्य दूसरी इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर्स की तरह सफलता पाना और उन इन्वेस्टर्स को आकर्षित करना है जो पहले प्रोजेक्ट्स की मुश्किलों से कतराते थे।
ज़मीन अधिग्रहण की मुश्किलें अब ख़त्म?
ज़मीन अधिग्रहण (land acquisition) भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए हमेशा एक बड़ी रुकावट रही है। PRAGATI द्वारा किए गए रिव्यू में बड़े प्रोजेक्ट्स के 35% अनसुलझे मुद्दे इसी से जुड़े थे। मौजूदा LARR एक्ट (LARR Act) तो ठीक है, लेकिन इसके प्रोसीजरल कॉम्प्लेक्सिटीज़ (procedural complexities), कंसेंट इश्यूज़ (consent issues), वैल्यूएशन डिस्प्यूट्स (valuation disputes) और अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच कोऑर्डिनेशन (coordination) की कमी इसे धीमा कर देती है। अब, ज़मीन अधिग्रहण से जुड़े सारे खर्चों और प्रक्रियाओं की ज़िम्मेदारी खुद उठाकर, इंडियन रेलवेज़ प्राइवेट पार्टनर्स के लिए प्रोजेक्ट्स को काफी डी-रिस्क (de-risk) करना चाहता है। ये वैसा ही कदम है जिसकी ज़रूरत हाईवे सेक्टर में भी महसूस की गई थी, जहाँ ज़मीन अधिग्रहण की मुश्किलों ने देरी और कॉस्ट ओवररन्स (cost overruns) को बढ़ावा दिया था। रेलवे का ये कदम प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन (project execution) को सुचारू बनाने में मदद करेगा, ठीक वैसे ही जैसे हाईवे प्रोजेक्ट्स को सरकार द्वारा ज़मीन अधिग्रहण की ज़िम्मेदारी लेने से फायदा हुआ।
क्या रेलवे PPPs में आएगी तेज़ी?
हालांकि, हाईवे सेक्टर की तुलना में रेलवे में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी ऐतिहासिक रूप से कम रही है। लेकिन इस नई पॉलिसी से ये गैप भरने की उम्मीद है। हाईवे सेक्टर में BOT (टोल), BOT (एन्युटी) और HAM जैसे मॉडल्स ने रिस्क मैनेजमेंट को बेहतर बनाया है। रेलवे में 50 साल की कंसेशन पीरियड देना, कई दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर एरियाज़ के बराबर या उससे ज़्यादा है। उदाहरण के तौर पर, एयरपोर्ट PPPs (PPPs) में भी 50 साल तक की कंसेशन दी जाती है। इससे रेलवे प्रोजेक्ट्स प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के लिए ज़्यादा कॉम्पिटिटिव (competitive) हो सकते हैं।
चुनौतियां और आशंकाएं
लेकिन, कुछ बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। पुरानी 2012 की पॉलिसी के तहत, दिसंबर 2025 तक केवल 18 प्रोजेक्ट ही पूरे हो पाए थे, जिनकी कुल वैल्यू ₹16,686 करोड़ थी। इससे पता चलता है कि कंसेशन पीरियड और लैंड एक्विजिशन के अलावा भी कुछ स्ट्रक्चरल इश्यूज़ (structural issues) हो सकते हैं। रेलवे ऑपरेशंस की कॉम्प्लेक्सिटी, सुरक्षा और ऑपरेशनल कंट्रोल का सरकार के हाथ में रहना, प्राइवेट कंपनियों के लिए रिस्क बढ़ा सकता है। साथ ही, अगर रीहैबिलिटेशन और रीसेटेलमेंट (rehabilitation and resettlement) ठीक से नहीं हुए, तो पब्लिक विरोध और कानूनी लड़ेाईयां हो सकती हैं। 50 साल जैसी लंबी कंसेशन पीरियड अपने साथ फाइनेंशियल और एग्जीक्यूशन रिस्क (execution risks) लाती है, जिसके लिए मज़बूत डिस्प्यूट रेज़ोल्यूशन मैकेनिज्म (dispute resolution mechanism) और परफॉरमेंस पैरामीटर्स (performance parameters) ज़रूरी होंगे।
इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट का भविष्य
इंडियन रेलवेज़ का यह स्ट्रेटेजिक कदम देश के इंफ्रास्ट्रक्चर के लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। 2040 तक अनुमानित ₹38.9 लाख करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट गैप को भरने के लिए प्राइवेट और इंस्टीट्यूशनल कैपिटल (institutional capital) का योगदान ज़रूरी है। PPP शर्तों को सुचारू बनाकर, सरकार इन्वेस्टर्स का भरोसा बढ़ाना चाहती है और कैपिटल कॉस्ट (capital cost) को कम करना चाहती है। रेलवे सुधारों की सफलता भारत के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा दे सकती है। कुल मिलाकर, सरकार के लगातार खर्च और मौजूदा एसेट्स (assets) को मॉडर्नाइज़ करने पर ज़ोर देने से इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में ग्रोथ की उम्मीद है।