इंडियन रेलवेज़ ने फिस्कल ईयर 2026 में रेवेन्यू के मामले में इतिहास रच दिया है। कंपनी ने **₹2.74 लाख करोड़** का रिकॉर्ड कलेक्शन किया है, जो पिछले साल के मुकाबले **3.2%** ज्यादा है। यह कमाल माल ढुलाई (freight volumes) में हुई बढ़ोत्तरी की वजह से संभव हुआ है। हालांकि, रेलवे खुद लिस्टेड नहीं है, लेकिन यह आंकड़े रेलवे से जुड़ी सरकारी कंपनियों के निवेशकों के लिए काफी अहम हैं।
माल ढुलाई बनी कमाई का बड़ा जरिया
इंडियन रेलवेज़ के कुल ₹2.74 लाख करोड़ के रेवेन्यू में अकेले माल ढुलाई (freight segment) का योगदान ₹1.73 लाख करोड़ रहा। इस दौरान 1,670 मिलियन टन माल ढोया गया, जो रेलवे को दुनिया के सबसे बड़े माल ट्रांसपोर्टरों में से एक बनाता है। सरकार की नई नीतियों और लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने की कोशिशों से माल की आवाजाही तेज हुई है, जिससे सड़क ट्रांसपोर्ट को टक्कर मिल रही है।
निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
यह समझना ज़रूरी है कि इंडियन रेलवेज़ खुद एक सरकारी कंपनी है और शेयर बाज़ार में लिस्टेड नहीं है। लेकिन, इसके शानदार प्रदर्शन का सीधा असर IRFC, IRCTC, RVNL, और IRCON जैसी पब्लिकली ट्रेडेड रेलवे कंपनियों पर पड़ता है। जब रेलवे का नेटवर्क बेहतर होता है और माल ढुलाई बढ़ती है, तो इन कंपनियों को ज़्यादा बिज़नेस मिलता है और उनके ऑर्डर बुक मजबूत होते हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर, पर खर्चे भी ज्यादा
सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार फोकस कर रही है। FY27 के लिए ₹2.78 लाख करोड़ का भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया है। देश भर में 514 बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जिनमें नई लाइनें बिछाना, गेज बदलना और पटरियों को डबल करना शामिल है। इन प्रोजेक्ट्स पर कुल लागत ₹8 लाख करोड़ से ज्यादा है।
रेवेन्यू तो बढ़ा है, लेकिन खर्चे भी कम नहीं हैं। FY26 के लिए ऑपरेटिंग रेश्यो (operational ratio) लगभग 98.43% रहने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब है कि रेलवे हर ₹100 कमाने के लिए करीब ₹98 खर्च कर रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश के साथ-साथ रोज़मर्रा के खर्चों को संभालना रेलवे के लिए एक बड़ी चुनौती है।
आगे क्या देखना होगा?
रेलवे में किए गए निवेश का असली फायदा तभी दिखेगा जब प्रोजेक्ट्स तेजी से पूरे होंगे और रेलवे लॉजिस्टिक्स सेक्टर में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा पाएगा। ऐसे में, निवेशक रेलवे के कैपिटल स्पेंडिंग प्लान्स, प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन और ऑपरेटिंग रेश्यो को कम करने के प्रयासों पर नज़र रखेंगे। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (Dedicated Freight Corridors) जैसे प्रोजेक्ट्स के शुरू होने से यह देखना अहम होगा कि कितनी जल्दी खर्च कम होता है और माल ढुलाई की लागत घटती है।
