Indian Exporters पर शिपिंग संकट का साया, लागत बढ़ने से व्यापार ठप

TRANSPORTATION
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Exporters पर शिपिंग संकट का साया, लागत बढ़ने से व्यापार ठप

भारतीय एक्सपोर्टर्स (Exporters) इस वक्त एक बड़ी लॉजिस्टिक्स (Logistics) समस्या से जूझ रहे हैं। कोलंबो और सिंगापुर जैसे पोर्ट्स पर भारी कंजेशन (Congestion) की वजह से जहाजों को **15 से 20 दिन** तक का इंतजार करना पड़ रहा है। ट्रेडिंग में अचानक आई तेजी और रूट बदले जहाजों ने शिपिंग रेट्स (Shipping Rates) और डिटेंशन चार्ज (Detention Charges) को आसमान पर पहुंचा दिया है। इस वजह से टेक्सटाइल, फार्मा और एग्रीकल्चर सेक्टर के बिजनेसेज पर भारी दबाव आ गया है, क्योंकि लॉजिस्टिक्स का बढ़ता खर्च उनके प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) को खत्म कर रहा है।

शिपिंग महंगा क्यों हो रहा है?

कई वजहें मिलकर इस स्थिति को पैदा कर रही हैं। चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड (Trade) में आई भारी तेजी के चलते कंटेनर कैपेसिटी (Container Capacity) का बड़ा हिस्सा पैसिफिक रूट्स (Pacific Routes) की तरफ चला गया है। इसके कारण भारत जैसे दूसरे रीजन्स के लिए कम शिप्स उपलब्ध हैं। ग्लोबल शिपिंग स्पेस की डिमांड बढ़ने से फ्रेट रेट्स (Freight Rates) में भारी उछाल आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, शंघाई से लॉस एंजेलिस जैसे बड़े रूट्स पर शिपिंग कॉस्ट पिछले साल के मुकाबले 130% से ज्यादा बढ़ गई है। इस ग्लोबल रस्साकशी के बीच, भारतीय एक्सपोर्टर्स को फीडर वेसल्स (Feeder Vessels) ढूंढने में भारी दिक्कत आ रही है, खासकर साउथ इंडियन पोर्ट्स से स्लॉट रेट्स (Slot Rates) में तेजी देखी जा रही है।

प्रॉफिट मार्जिन और ऑपरेशंस पर असर

कई भारतीय बिजनेसेज के लिए, ये देरी सिर्फ ऑपरेशनल सिरदर्द नहीं, बल्कि सीधे तौर पर उनके फाइनेंस पर चोट है। टेक्सटाइल, गारमेंट्स, फार्मा और एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट जैसे सेक्टर अक्सर पतले प्रॉफिट मार्जिन पर काम करते हैं और टाइट 'जस्ट-इन-टाइम' डिलीवरी शेड्यूल पर निर्भर करते हैं। जब शिपमेंट में देरी होती है या कार्गो को बाद के शिप्स पर रोलओवर किया जाता है, तो एक्सपोर्टर्स को अक्सर भारी डिटेंशन और डिमरेज चार्जेज (Demurrage Charges) का सामना करना पड़ता है। ये वो फीस होती है जो शिपिंग कंटेनर्स को पोर्ट या यार्ड में तय समय से ज्यादा रखने पर देनी पड़ती है।

क्योंकि कई एक्सपोर्टर्स के पास बड़े ग्लोबल कॉरपोरेशन्स जैसी बार्गेनिंग पावर (Bargaining Power) नहीं होती, इसलिए उन्हें अक्सर ये अतिरिक्त खर्च खुद उठाना पड़ता है, जिससे उनकी प्रॉफिटेबिलिटी सीधे तौर पर कम हो जाती है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन्स (FIEO) ने कॉमर्स मिनिस्ट्री (Ministry of Commerce) और पोर्ट्स मिनिस्ट्री (Ministry of Ports) के साथ मिलकर इन चिंताओं को दूर करने के लिए सक्रिय रूप से बातचीत की है। उन्होंने खास तौर पर कुछ शिपिंग लाइन्स द्वारा नॉन-ट्रांसपेरेंट बिलिंग (Non-transparent Billing) और इस हाई-डिमांड पीरियड के दौरान 'ऑपर्चुनिस्टिक प्राइसिंग' (Opportunistic Pricing) के मुद्दों को उठाया है।

लॉन्ग-टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर चैलेंज

यह मौजूदा संकट विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब्स (Transhipment Hubs) पर स्ट्रक्चरल डिपेंडेंस (Structural Dependence) को उजागर करता है। जब कोलंबो या सिंगापुर जैसे पोर्ट्स ऑपरेशनल स्ट्रेस (Operational Stress) का सामना करते हैं, तो भारतीय एक्सपोर्टर्स के पास बहुत कम विकल्प बचते हैं, जिससे उनकी सप्लाई चेन्स (Supply Chains) कमजोर हो जाती हैं। इस निर्भरता को कम करने के लिए, भारत अपने खुद के इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप करने पर फोकस कर रहा है। केरल में विझिंजम इंटरनेशनल डीपवाटर मल्टीपर्पस पोर्ट (Vizhinjam International Deepwater Multipurpose Port) जैसी प्रोजेक्ट्स को एक बड़े डोमेस्टिक ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल के रूप में डिजाइन किया जा रहा है। अगर ये प्रोजेक्ट्स सफल होते हैं, तो भारतीय सामान सीधे भारतीय तटों से बड़े जहाजों पर लोड किए जा सकेंगे, जिससे लॉजिस्टिक्स कॉस्ट (Logistics Costs) कम हो सकती है और विदेशी पोर्ट्स में कार्गो के इंतजार का समय भी घट सकता है।

आगे चलकर, इन्वेस्टर्स (Investors) और बिजनेसेज के लिए मुख्य मॉनिटरेबल (Monitorables) फ्रेट रेट्स की स्टेबिलिटी और पोर्ट कंजेशन को कम करने के लिए सरकारी प्रयासों की इफेक्टिवनेस (Effectiveness) होगी। मुंबई के पास स्थित मुद्रा (Mundra) और नावा शेवा (Nhava Sheva - JNPT) जैसे बड़े भारतीय हब्स पर लगातार देरी एक बड़ी चुनौती बनी रह सकती है, और वेसल अवेलेबिलिटी (Vessel Availability) में किसी भी सुधार के लिए ग्लोबल शिपिंग ट्रेंड्स (Global Shipping Trends) पर निर्भर रहना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.