एविएशन कंपनियां सरकार से 'प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड' (PSF) में बदलाव की मांग कर रही हैं। बढ़ती ईंधन कीमतों के कारण फाइनेंशियल ईयर 2027 में इंडस्ट्री को भारी नुकसान का डर है, जिसका असर रीजनल फ्लाइट्स की कनेक्टिविटी पर भी पड़ सकता है।
एविएशन सेक्टर की दिग्गज कंपनियां सरकार से 'प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड' को दोबारा शुरू करने और उसे अधिक लचीला बनाने की गुहार लगा रही हैं। जेट फ्यूल (ATF) की कीमतें एयरलाइन के कुल ऑपरेटिंग खर्च का 40% से अधिक हिस्सा हैं। कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के कारण पैसेंजर डिमांड अच्छी होने के बावजूद कंपनियां मुनाफा कमाने में जूझ रही हैं।
जून 2026 में सरकार ने ₹10,000 करोड़ का जो सपोर्ट पैकेज पेश किया था, वह कड़े नियमों के कारण फेल रहा। अब एयरलाइंस चाहती हैं कि सरकार ऐसे कड़े प्रावधानों को हटाए ताकि लिक्विडिटी बनी रहे और फ्यूल कॉस्ट को कंट्रोल किया जा सके।
सेक्टर पर वित्तीय दबाव (Financial Heat)
रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2027 में भारतीय एविएशन इंडस्ट्री को ₹36,000 करोड़ से ₹38,000 करोड़ तक का नेट लॉस हो सकता है। यह पिछले साल के ₹28,000 करोड़ - ₹30,000 करोड़ के अनुमान से कहीं ज्यादा है। इसका ताजा उदाहरण IndiGo के नतीजे हैं, जिसने Q2 FY27 में ₹1,879.1 करोड़ का नेट लॉस दर्ज किया है।
कनेक्टिविटी पर संकट
खासकर रीजनल एयरलाइंस, जो देश के करीब 35% यूनिक रूट्स कवर करती हैं, वे सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। कैश बचाने के लिए कंपनियों ने अपनी कैपेसिटी में 15% से 20% तक की कटौती शुरू कर दी है, जिससे छोटे शहरों में हवाई कनेक्टिविटी पर असर पड़ना तय है।
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical tensions) और भारतीय रुपया में कमजोरी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। साथ ही, 1 जनवरी 2027 से लागू होने वाले 'भारतीय वायुयान नियम, 2026' के तहत सरकार एयरफेयर पर दखल दे सकेगी, जो कंपनियों के लिए फ्यूल कॉस्ट को टिकट प्राइस में जोड़कर ग्राहकों पर डालने की चुनौती और बढ़ा देगा।
