भारतीय एविएशन सेक्टर में अब 'अर्ली बर्ड डिस्काउंट' का दौर लगभग खत्म हो चुका है। IndiGo और Air India ग्रुप की अगुवाई में एयरलाइंस अब लंबे समय पहले टिकट बुक करने पर भी भारी छूट नहीं दे रही हैं, ताकि फ्यूल लागत के बीच अपने मार्जिन को सुरक्षित रखा जा सके।
भारत में हवाई यात्रा को लेकर पुरानी कहावत 'जितना जल्दी बुक करेंगे, उतना सस्ता सफर होगा' अब बीते कल की बात हो गई है। बड़ी एयरलाइंस ने अपनी प्राइसिंग रणनीति में बड़ा बदलाव किया है, जिससे अर्ली प्लानर्स को अब कोई खास फायदा नहीं मिल रहा। यात्री आज टिकट बुक करें या कई हफ्ते पहले, किराया लगभग एक जैसा ही दिखाई दे रहा है।
क्यों खत्म हुआ कंपटीशन?
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह भारतीय एविएशन मार्केट का 'डुपोली' (Duopoly) में तब्दील होना है। IndiGo और Air India ग्रुप मिलकर घरेलू बाजार के 90% से ज्यादा हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। इस एकाधिकार के कारण पहले जैसा कड़ा कंपटीशन अब कम हो गया है, जिससे कंपनियां वॉल्यूम के बजाय 'यील्ड' (सीट से होने वाली कमाई) पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
बढ़ता फ्यूल खर्चा और फ्यूल सरचार्ज
एयरलाइंस के मार्जिन पर फ्यूल कीमतों का बड़ा दबाव है। Aviation Turbine Fuel (ATF) की कीमतों में 1 अक्टूबर 2026 को 13.2% की बढ़ोतरी हुई थी। इसके जवाब में IndiGo, Air India, Air India Express और Akasa Air ने 9 अक्टूबर 2026 से फ्यूल सरचार्ज में इजाफा किया है ताकि बढ़ते ऑपरेटिंग खर्चों की भरपाई की जा सके।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
यह नई रणनीति कंपनियों के लिए तो मुनाफा बढ़ा सकती है, लेकिन शेयरधारकों के लिए रिस्क भी है। महंगे टिकटों के कारण यात्रियों की डिमांड में कमी आ रही है। अगस्त 2026 में घरेलू हवाई यात्रियों की संख्या में सालाना आधार पर 6.34% की गिरावट दर्ज की गई। अगर किराये में नरमी नहीं आई, तो यात्री संख्या में और गिरावट आ सकती है, जो एयरलाइंस के मैनेजमेंट के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति होगी।
निवेशकों को अब कंपनियों के आने वाले फाइनेंशियल रिजल्ट्स पर बारीक नजर रखनी चाहिए, ताकि यह साफ हो सके कि क्या बढ़ी हुई कमाई से पैसेंजर ट्रैफिक में आई कमी की भरपाई हो पा रही है या नहीं। साथ ही, सरकारी दखल का जोखिम भी बना हुआ है, क्योंकि बढ़ती कीमतों पर रेगुलेटरी स्क्रूटनी बढ़ सकती है।
