Indian Airfares: यात्री संख्या घटी, पर किराए आसमान पर! एयरलाइंस ने क्यों कम की फ्लाइट्स?

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AuthorNeha Patil|Published at:
Indian Airfares: यात्री संख्या घटी, पर किराए आसमान पर! एयरलाइंस ने क्यों कम की फ्लाइट्स?

भारत में हवाई सफर महंगा बना हुआ है, भले ही यात्री संख्या में कमी आई हो। जुलाई 2026 में डोमेस्टिक पैसेंजर ट्रैफिक **4.8%** गिरा है, लेकिन एयरलाइंस अपनी फ्लाइट्स की संख्या में भारी कटौती कर रही हैं ताकि उड़ानों में सीटें भरी रहें। इस रणनीति से कंपनी अपने मुनाफे को बचा रही है, लेकिन यह आम यात्रियों के लिए परेशानी का सबब बन गया है और सुप्रीम कोर्ट की नजर भी इस पर है।

मुनाफे के लिए फ्लाइट्स कम, सीटें फुल

भारतीय एयरलाइंस इस समय वॉल्यूम (यात्री संख्या) से ज्यादा प्रॉफिटेबिलिटी पर फोकस कर रही हैं। फ्लाइट्स की संख्या घटाकर, वे यह सुनिश्चित कर रही हैं कि जो भी फ्लाइट्स उड़ रही हैं, उनमें 83% से ज्यादा सीटें भरी रहें। इस "कैपेसिटी डिसिप्लिन" की वजह से एयरलाइंस ऊंची टिकट दरें बनाए रखने में कामयाब हो रही हैं। यह कदम इसलिए भी जरूरी है क्योंकि एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतें बढ़ी हुई हैं और भारतीय रुपया भी दबाव में है। ऐसे में, कंपनियां अपनी लागत को कंट्रोल में रखने और मार्जिन को बचाने के लिए यह रास्ता अपना रही हैं।

5 साल में सबसे धीमी ग्रोथ

2026 के पहले सात महीनों के आंकड़े बताते हैं कि एयरलाइन इंडस्ट्री कितनी धीमी हो गई है। डोमेस्टिक पैसेंजर ट्रैफिक में सालाना ग्रोथ सिर्फ 0.64% रही है, जो पिछले 5 सालों में सबसे कम है। इस माहौल में, IndiGo जैसी बड़ी एयरलाइन, जिसका जुलाई 2026 में मार्केट शेयर 67.4% था, और Air India Group, जिसका शेयर 24% है, सप्लाई को सावधानी से मैनेज कर रही हैं। इंडस्ट्री की यह कैपेसिटी रिडक्शन रणनीति कहीं न कहीं प्राइस वॉर को रोक रही है, जिसकी वजह से यात्रियों को महंगे टिकट खरीदने पड़ रहे हैं।

निवेशकों के लिए बड़े जोखिम

हालांकि, एयरलाइंस का यह तरीका शॉर्ट-टर्म में उनके नतीजे सुधार सकता है, लेकिन निवेशकों के लिए कुछ बड़े जोखिम भी खड़े करता है। पहला है "डिमांड डिस्ट्रक्शन" का खतरा। अगर हवाई किराए लंबे समय तक ऊंचे बने रहे, तो कीमत के प्रति संवेदनशील यात्री दूसरे ट्रांसपोर्ट ऑप्शन चुन सकते हैं, जिससे इंडस्ट्री की ग्रोथ और धीमी हो जाएगी।

दूसरा, इंडस्ट्री की कॉस्ट स्ट्रक्चर अभी भी नाजुक है। एयरलाइन का प्रॉफिट काफी हद तक ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों पर निर्भर करता है, जो फ्यूल कॉस्ट तय करती हैं। साथ ही, भारतीय रुपये की स्थिरता भी अहम है, क्योंकि विमानों की लीजिंग और मेंटेनेंस कॉस्ट अक्सर डॉलर में होती है। इन दोनों में कोई भी नकारात्मक बदलाव, टिकट की ऊंची दरों से हुई कमाई को तुरंत खत्म कर सकता है।

तीसरा, रेगुलेटरी पहलू भी है। हवाई किराए में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचा है, जो इस मामले पर नजर रखे हुए है। सरकार ने भी संकेत दिया है कि एक नया रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने के अंतिम चरण में है। निवेशकों को ऐसी किसी भी पॉलिसी चेंज पर नजर रखनी चाहिए जो एयरलाइंस द्वारा टिकट की कीमतें तय करने या अपनी कैपेसिटी मैनेज करने के तरीके को सीमित कर सकती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.