भारत में हवाई यात्रियों को अभी भी ऊंची कीमतों का सामना करना पड़ेगा। भले ही जेट फ्यूल के दाम कम हुए हों, लेकिन एयरलाइंस अपने मार्जिन को सुधारने के लिए टिकट के दाम घटाने के मूड में नहीं हैं।
एशिया-पैसिफिक रीजन में एयरलाइंस अब मार्केट शेयर के बजाय सीधे तौर पर प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) को प्राथमिकता दे रही हैं। S&P Global Ratings की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही 2026 की शुरुआत के मुकाबले जेट फ्यूल की कीमतों में नरमी आई है, लेकिन कंपनियां इस मौके का फायदा उठाकर अपने बैलेंस शीट को मजबूत करने में जुटी हैं।
पैसेंजर डिमांड और एयरलाइंस की रणनीति
इस रणनीति के पीछे 'इनइलास्टिक डिमांड' का बड़ा हाथ है। यानी, किराया बढ़ने के बावजूद यात्री कम नहीं हो रहे हैं और लोग कनेक्टिविटी के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने को तैयार हैं। आमतौर पर, किसी भी एयरलाइन के कुल खर्च का 30% से 40% हिस्सा ATF (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) पर खर्च होता है, जिसे अब एयरलाइंस अपने प्रॉफिट मार्जिन को बचाने के लिए कम नहीं करना चाहतीं।
सेक्टर का हाल और IndiGo पर दबाव
इस सेक्टर की चुनौतियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की सबसे बड़ी एयरलाइन IndiGo ने फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही में ₹238 करोड़ का नेट लॉस दर्ज किया है। रेटिंग एजेंसी ICRA ने भी इंडियन एविएशन इंडस्ट्री को लेकर अपना आउटलुक 'नेगेटिव' रखा है।
क्या हैं रिस्क फैक्टर्स?
- करंसी का असर: रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहा है, जिससे लीजिंग और मेंटेनेंस का खर्च बढ़ रहा है क्योंकि ये भुगतान डॉलर में होते हैं।
- भू-राजनीतिक तनाव: वेस्ट एशिया में बढ़ता तनाव कभी भी कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ला सकता है।
- मांग में कमी का डर: अगर किराए लंबे समय तक ऊंचे बने रहते हैं, तो भविष्य में डिमांड पर असर पड़ सकता है, जो एयरलाइंस की 'प्राइसिंग पावर' को सीमित कर सकता है।
