सरकार का डबल गेम: कॉम्पिटिशन बढ़ाएं या रेवेन्यू?
सरकार का मानना है कि किसी एक कंपनी को सारे एयरपोर्ट्स का मालिकाना हक देना ठीक नहीं है। वे चाहते हैं कि मार्केट में ज्यादा से ज्यादा कंपनियां हिस्सा लें। लेकिन, बोली की ऊपरी सीमा तय करने से सरकार को मिलने वाला रेवेन्यू कम हो सकता है। यह एक मुश्किल फैसला है, जिसमें कॉम्पिटिशन और रेवेन्यू के बीच संतुलन बनाना होगा।
छोटे एयरपोर्ट्स को मिलेगी संजीवनी: बंडलिंग का नया दांव
सरकार ने एक और रणनीति अपनाई है। 7 छोटे और कम कमाई वाले एयरपोर्ट्स को 6 बड़े और ज्यादा कमाई वाले एयरपोर्ट्स के साथ जोड़ा जाएगा। उदाहरण के लिए, वाराणसी को कुशीनगर और गया के साथ, और अमृतसर को कांगड़ा के साथ जोड़ा जाएगा। इसका मकसद छोटे एयरपोर्ट्स के डेवलपमेंट के लिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करना है, ताकि वे बड़े एयरपोर्ट्स के रेवेन्यू पोटेंशियल का फायदा उठा सकें।
Adani Group की बड़ी तैयारी, GMR भी मैदान में
Adani Group पहले ही 6 एयरपोर्ट जीत चुका है और अब इन 11 एयरपोर्ट्स के लिए भी बोली लगाने का इरादा रखता है। Adani Group के पास पहले से ही मुंबई, अहमदाबाद और लखनऊ जैसे बड़े एयरपोर्ट हैं। दूसरी ओर, GMR Group, जो दिल्ली और हैदराबाद एयरपोर्ट का संचालन करता है, वो भी इस बोली में शामिल हो सकता है।
रेगुलेटरी मंजूरी का इंतजार, एविएशन सेक्टर का बड़ा प्लान
इस नई बोली नीति को नागरिक उड्डयन मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और नीति आयोग जैसे बड़े सरकारी संस्थान रिव्यू कर रहे हैं। फाइनल फैसला पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप एप्रैजल कमेटी (PPPAC) लेगी। यह सब भारत के नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए पैसा जुटाना है। भारत का लक्ष्य आने वाले दशकों में करीब 350 एयरपोर्ट्स का नेटवर्क तैयार करना है, ताकि बढ़ती यात्री संख्या को संभाला जा सके।
Adani Enterprises के नंबर्स क्या कहते हैं?
Adani Enterprises के शेयर में निवेशकों का भरोसा दिखता है। इसका प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेशियो अक्सर इंडस्ट्री के औसत से ज्यादा रहता है, जो 27.32 या 21.91 के आसपास है, जबकि सेक्टर का औसत 65.54 है। कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन भी बहुत बड़ा है, करीब ₹2.52 ट्रिलियन या ₹3.07 ट्रिलियन। हालांकि, अगर ग्रोथ की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं तो वैल्यूएशन का रिस्क भी है। कंपनी पर 162.60 का डेट-टू-इक्विटी रेशियो है, जो काफी ज्यादा है। इसका इंटरेस्ट कवरेज रेशियो 1.73 है, यानी कर्ज चुकाने में ज्यादा गुंजाइश नहीं है।
मोनोपॉली की चिंता और पिछली बोलियों का इतिहास
चिंता यह भी है कि अगर एयरपोर्ट्स एक ही कंपनी के हाथ में चले गए तो यात्रियों से वसूले जाने वाले शुल्क (User Fees) बढ़ सकते हैं। 2018 की बोली में Adani Group ने प्रति यात्री काफी ज्यादा शुल्क देने की पेशकश की थी, जिससे वे जीत गए। इससे भविष्य में यात्रियों की जेब पर बोझ पड़ने की आशंका है। पिछली प्राइवेटाइजेशन डील्स में नियमों में बदलाव और किसी खास बिडर को फायदा पहुंचाने के आरोप भी लगे हैं।
