संकट की जड़: पश्चिम एशिया का तनाव और शिपिंग पर मार
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का सीधा असर भारत के समुद्री व्यापार पर पड़ रहा है। माल ढुलाई की लागत (freight rates) अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत के पश्चिमी तट से मध्य पूर्व तक कंटेनर शिपिंग दरें आसमान छू रही हैं। 20-फुट इक्विवेलेंट यूनिट (TEU) के लिए दरें 750% तक और 40-फुट इक्विवेलेंट यूनिट (FEU) के लिए दरें 909% तक बढ़ गई हैं (2 मार्च 2026 तक के आंकड़े)।
इसके अलावा, युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम (war-risk insurance premiums) में 40-50% की वृद्धि हुई है, जिससे जहाज मालिकों के लिए परिचालन लागत (operational expenses) और बढ़ गई है। इस वजह से, भारत के लगभग 38,000 कंटेनर पश्चिम एशिया के लिए फंसे हुए हैं, जिनमें बासमती चावल और अन्य जल्दी खराब होने वाला सामान (perishable goods) शामिल है। शिपिंग लाइनों ने आपातकालीन संघर्ष सरचार्ज (emergency conflict surcharges) लागू कर दिए हैं और कुछ बुकिंग भी रद्द कर दी हैं। यह संकट होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों से गुजरने वाले सप्लाई चेन की नाजुकता को उजागर करता है।
कैवोटेज नियम: इतिहास और भारत का रुख
भारत के कैवोटेज नियम पारंपरिक रूप से घरेलू शिपिंग उद्योग की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में इन्हें उदार बनाने के प्रयास हुए हैं। साल 2018 और 2023 में किए गए पिछले ढील का उद्देश्य भारत के बंदरगाहों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना और कोलंबो व सिंगापुर जैसे विदेशी ट्रांशिपमेंट हब पर निर्भरता कम करना था। इन कदमों का लक्ष्य विदेशी-ध्वजांकित जहाजों को भारतीय बंदरगाहों के बीच निर्यात-आयात (EXIM) ले जाने वाले कंटेनरों के ट्रांशिपमेंट या खाली कंटेनरों के परिवहन की अनुमति देना था, ताकि कार्गो को भारत में ही समेकित किया जा सके।
वैश्विक स्तर पर भी, समुद्री उद्योग भू-राजनीतिक अस्थिरता के अनुकूल हो रहा है। व्यापार मार्ग अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) के चक्कर लगा रहे हैं, जिससे यात्रा के समय में 15-20 दिन की वृद्धि हो रही है और लागतें बढ़ रही हैं। दुनिया भर में कंटेनर की कमी भी एक वैश्विक समस्या है, जो महामारी से जुड़ी बाधाओं और असंतुलित वितरण के कारण और बढ़ गई है। भारत की अपनी अवसंरचना (infrastructure) संबंधी चुनौतियां, जैसे पूर्वी तट पर बंदरगाहों की कम गहराई, बड़े जहाजों को डॉक करने में बाधा डालती हैं, जिससे कार्गो के डायवर्जन के कारण सालाना ₹1,500-4,500 करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है।
घरेलू शिपिंग पर असर: फायदे और चिंताएं
कैवोटेज नियमों में संभावित ढील से अल्पावधि में राहत मिल सकती है, लेकिन इसके भारत के घरेलू समुद्री क्षेत्र के लिए निहित जोखिम भी हैं। ऐतिहासिक रूप से, ऐसी ढील से स्थानीय हितधारकों को विदेशी जहाजों से प्रतिस्पर्धा का डर रहा है, जिनके संचालन की लागत कम होने के कारण वे भारतीय जहाज मालिकों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह कदम भारतीय लाइनर्स पर प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ा सकता है, जो पहले से ही बढ़े हुए बीमा और ईंधन लागत का हवाला दे रहे हैं।
इसके अलावा, घरेलू माल के लिए विदेशी-ध्वजांकित जहाजों पर बढ़ती निर्भरता भारत के अपने बढ़ते बेड़े के विकास की संभावनाओं को कम कर सकती है। पिछले दशक में भारत के जहाजों की संख्या 1,205 से बढ़कर 1,549 हुई है। विश्लेषक (Analysts) इस बात पर जोर देते हैं कि भू-राजनीतिक जोखिम शिपिंग क्षेत्र के दृष्टिकोण को लगातार प्रभावित कर रहे हैं, जिससे अस्थिरता बने रहने और निवेश में सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है।
भविष्य की राह
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव बने रहने के कारण, समुद्री क्षेत्र पर दबाव बने रहने की उम्मीद है, जिसमें माल ढुलाई दरों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन में अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है। कैवोटेज नियमों में प्रस्तावित ढील से तत्काल राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन घरेलू शिपिंग क्षमता और प्रतिस्पर्धा पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव की बारीकी से जांच की जाएगी। विश्लेषकों का मानना है कि भू-राजनीतिक जोखिम शिपिंग उद्योग के भविष्य को आकार देते रहेंगे, जिसका अर्थ है निवेशकों के लिए सावधानी का दौर। भारत को अपनी तत्काल जरूरतों और एक मजबूत, आत्मनिर्भर घरेलू समुद्री उद्योग के दीर्घकालिक लक्ष्य के बीच संतुलन बनाना होगा।